"कामरान! अबे कामरान मेरी मोपेड का पंचर बनवाया कि नहीं।" गुसलखाने से पानी की धार के गिरने के बीच इशरत अली की फटे बाँस सी आवाज ने सवेरे का अलसाया सन्नाटा तोड़ा। "अरे कामरान है कहाँ, वह तो सवेरे ही निकल गया है मैच खेलने"। यह सबेरे का नाश्ता तैयार करती नसीबन की आवाज थी जिसके नसीब में अलसुबह चिमटे का दीदार ही मयस्सर था, चैन की नींद नही।
यह बकरमंडी की ढाल पर अपने पुरसाहाल को रोती हाजी मोईनुद्दीन की पचासी साल पुरानी हवेली में बने दर्जनो दड़बेनुमा कमरों में से एक, कमरा नं ५६ का, रोज सुबह दोहराया जाने वाला वाकया था। इशरत अली का कुलजमा पाँच बंदों का खानदान यहाँ रहता था। खुद एक प्राईवेट फर्म में मुनीमगीरी करने वाले इशरत अली, उनकी खातून नसीबन बानो, निकम्मा बेटा कामरान, बेटी पलक और इशरत अली की कानी माँ जरीना बानो। "या खुदा कब इस लड़के की अक्लदाड़ निकलेगी, पहाड़ी दुम्बे जितना मुस्टंडा हो गया है पर काम के वक्त हमेशा रफूचक्कर", इशरत अली चारखाने का तौलिया लपेटे बड़बड़ाते हुए गुसलखाने से निकले। इससे पहले की नसीबन आँखे तरेर कर अपने लड़के का बचाव करती, इशरत अली बड़बड़ाते रहे,
"अजी अब यह मत कहना कि अभी लड़का ही तो है। तुम्हारे चश्मे बद्दूर का न तो स्कूल कालेज में जी लगा न फजलू के पावरलूम की नौकरी में। खुदा जाने क्या करेगा? सबेरे शाम बल्ला घुमाने से क्या गावस्कर बन जायेगा?
"अब्बा यह गावस्कर के जमाने लद गये अब तो तेंदुलकर का जमाना है। "
यह इशरत की बेटी थी जो रोजाना होने वाली बिजली कटौती की वजह से लालटेन की पीली रोशनी में अपना होमवर्क निपटा रही थी और गाहेबगाहे माँ बाप की चखचख के बीच अपनी नुक्ताचीनी के बजरिये जिंदगी में खोयी हँसी ढूढती थी।
खैर इशरत अली को आज भी सूखे आचार और नसीबन की करेले सरीखी जुबान से निकले तानो के साथ अपने नाश्ते में अधजले परांठे निगलने थे। आज फिर उन्हे आठ सवारियों की जगह में बारह आदमियों के बीच ठूँसकर टेंम्पू में बैठना था। आज फिर रास्ते भर अपने नामाकूल लड़के को मन ही मन गरियाना था जो मुँह-अंधेरे उनकी दुलारी मोपेड लेकर क्रिकेट का मैच खेलने रफूचक्कर हो गया था। आज फिर उन्हें दुकान के मालिक के बीस साल के नौजवान बेटे से देर से आने बार गालियाँ खानी थी जो खुद बचपन में उनके सँग उँगली पकड़ कर दुकान से घर जाता था। आज फिर उस डाँट के बीच उस बीस साल की कंप्यूटर आपरेटर की फिच्च से निकलने वाली हँसी उनके दिल में नश्तर की तरह चुभने वाली थी।
"कुतर*दी।" इशरत अली के मुँह से उस कंप्यूटर आपरेटर के लिए टेंम्पू के धचको के बीच गाली निकली। "हाँय, यह गाली किसको दे रहे हो मियाँ?" टेंपो में उनके सामने बैठी एक मुटल्ली औरत चीखी। इशरत अली को इल्म हुआ कि सामने बैठी खातून समझी है कि उन्होने उसे गाली बकी है। एक पल में बखेड़ा खड़ा हो गया। हजार बार समझाने के बाद भी वह शैतान की खाला नही मानी। और तो और टेंम्पू वाला भी उस औरत का साथ देने लगा। इशरत अली को माजरा समझते देर न लगी। सामने वाली औरत बैकवर्ड क्लास की थी और टेंम्पू वाला भी। दोनो इशरत अली की अनजाने में मुँह से निकली गाली को खुद पर किया गया जातिगत हमला समझ बैठे थे और सरेआम इशरत अली की जूतम पैजार करने पर अमादा थे। इशरत अली अब उस घड़ी को कोस रहे थे जब वे खुद को ख्यालों मे खो गये थे। उनका दिल बराबर उनकी दुकान में काम करने वाली कंप्यूटर आपरेटर को लानते भेज रहा था।
इशरत अली को यह दिन भी देखना मँजूर था कि दुकान के मालिक ने तो उम्र भर इज्जत बख्शी, उन्होने भी कभी हिसाब में दो पाइ का फर्क न आने दिया। पर बदलते जमाने को हाय लग गयी थी। शैतान के घर से कंप्यूटर नाम की चीज आ धमकी थी। पल भर में महीनो के हिसाब का चिठ्ठा छाप देता था कमबख्त। कुछ उस कंम्पयूटर का जादू कुछ वह बेहया कंप्यूटर आपरेटर जिसकी वजह से दुकान के मालिक का लड़का उनके जैसे सभी पुराने काम करने वालो को चलता कर देने पर अमादा था। इशरत अली का खुद का लड़का कामरान कभी उनके कहे पर कान न देता था। बस सबेरे शाम एक ही धुन, दो नाटे कद के क्रिकेटरों ने टीवी से चिपके रहने वाले छोकरो पर न जाने कौन सा काला जादू कर दिया था कि सबेरे शाम सिर्फ बल्ले घुमाया करते थे।
वैसे पड़ोस वाले दर्जी खुर्शीद ने बड़ी वजन की बात कही थी उनसे "मियाँ, खुदा का शुक्र मनाओ कि लड़के क्रिकेट में मशगूल हैं, खुदा गारत करे इन मुफ्ती मौलवियों को जो पराये घर की आग से अपना ही घर जलाने पर अमादा है। अमाँ न जाने कौन से फिलीस्तीन और ईराक के मुआमलों के चर्चे गा गाकर पहले काश्मीर और अब गुजरात में दहशतगर्दी की ओर धकेल दिया हमारे लड़को को। मियाँ, इन अक्ल के अँधे लड़को से कोई पूछे कि गर ईंगलिस्तान में कोई किसी किताब में कुछ लिखता है तो तुम्हें अपने ही टाकीजों और बसों को सुपुर्दे खाक करने की क्या जरूरत है। " इशरत अली ने पूछा था कि "अमें खुर्शीद, तुम भी कहाँ कहाँ से चंडूखाने की खबर लाते हो। हाँ कल बड़े चौक पर लड़को ने बवाल किया था। पर मैं तो समझा था कि वे कालिज की बढ़ी फीस के खिलाफ आवाज बुलँद कर रहें हैं।" खुर्शीद ने उन्हे मानो गर्म रेत पर ला खड़ा किया था, वह बोला था " भाई इशरत, तुम भी यार आँखे बँद करके जीते हो। अमाँ यह लौंडे गर बड़ी फीस या बड़े तेल के दाम को लेकर हँगामा करे तो यह मुल्क कब का सुधर जाये, पर यह सब तो किसी रश्दी की किताब पे हल्लाबोले हैं। जिस किताब को न ये पढ़ सकते हैं, न इनके नुमाँया मुफ्ती।"
"अबे, क्या चू**पा है? क्यों गाली देता हैं औरतों को?" इशरत अली के कानो में पिघले सीसे के मानिंद थानेदार की आवाज पड़ी तो वे मानो नींद से बाहर आ गये।
[अगला अध्याय: लेखक ~ गोविन्द उपाध्याय]