Thursday, January 13, 2005

अध्याय २ : पिचकना सपनों के गुब्बारे का

[गताँक से आगे]

'रवि जो अपनी बेखुदी में मानों वेगास के आसमान से तैर रहा था, उसके ख्यालों के गर्म गुब्बारे में विभा के इस पैंतरे का काँटा लगा और वह धड़ाम से असलियत के रेगिस्तान में जा गिरा' :: इसी कहानी सेरात को सोने से पहले रवि के माँ-बाप अकेले में इस बात पर सलाह करने लगे। रवि की माँ ने कहा कि "देखो जी वैसे तो यह बाहर जाने का सुनहरा मौका है, अपने वर्मा जी का लड़का तीन साल कोशिश करता रहा, पर भाग्य में नहीं था तो नहीं जा पाया। कभी किसी कारणवश देरी हो गई, तो कभी वीज़ा नहीं लगा। भगवान की कृपा से रवि को तो कोई अड़चन नहीं आई। पर फिर सोचती हूँ कि इकलौता बेटा है ये भी परदेस चला गया तो क्या होगा। सुना है एक बार किसी का बाहर मन लग जाए तो कभी वापिस नहीं आता। इस रवि को तो वैसे ही बाहर की चीजों का बड़ी शौक है। ऊपर से विभा का क्या होगा। हम ने कब से उसे अपनी बहू बनाने का सोच रखा है और फिर उस के भी तो अरमान हैं। मैं तो कहती हूँ कि यह सब सोचते हुए रवि और विभा की शादी करा देतें हैं उसके बाद इनका जो जी में आए करें।" रवि के पिता जी ने भी स्वीकृति में सिर हिलाया।


सुबह होते ही रवि की माँ बाप के सामने पेशी हुई और उसे फैसला सुनाया गया। अंदर से तो रवि को खुशी हुई की चलो परदेस में मन का मीत साथ ही होगा। पर दिमाग ने कहा मूर्ख परदेस में अपनी सुध तो होगी नहीं, बेचारी विभा का क्या होगा। रवि ने विभा को समझाया कि शुरू मे अमेरिका में पाँव जमाने में परेशानी होगी इसलिए वह उसे अभी अकेले जाने की आजादी दे दे। रवि की उम्मीद के विपरीत विभा न सिर्फ आसानी से मान गयी बल्कि उसने रवि के माता पिता को भी इस निर्णय के लिए रजामंद कर लिया।


समय पंख लगाकर उड़ गया। रवि का कोर्स पूरा हो गया, उसे अच्छी नौकरी भी अमेरिका में मिल गयी। वह भारत गया पर विभा से समय कम होने का बहाना बना कर दिल्ली मिलने नही गया जहाँ वह नौकरी करती थी। दरअसल अब रवि को छाया से ईश्क हो गया था जो उसके मैनेंजमेंट कोर्स में उसकी अध्यापिका थी। रवि को उसकी शोख अदायें भा गई थी और वह विभा को बहनजी छाप समझकर उससे पीछा छुड़ाना चाहता था। एक पार्टी के दौरान रवि से छाया ने अपने दिल की बात कह दी और दोनो ने शादी कर ली। रवि के पिता ने गुस्से में उससे संबध तोड़ लिए। हलाँकि मनन के पैदा होने के बाद रवि की माँ ने अमेरिका जाने को लेकर भूख हड़ताल कर दी और रवि के पिताजी को हथियार डालने पड़े। रवि विभा को भूल गया। धीरे धीरे रवि की जिंदगी भी औसत एनआरआई की तरह हो गई थी जो पाँच दिन आफिस से घर और घर से आफिस के बीच जुता रहता है और बाकी दो दिन बीबी को शापिंग माल घुमाते घुमाते थककर चूर हो जाता है। ऐसा ही एक महाबोर शनिवार आज था जब उसे यकायक विभा दिखी शापिंग माल में।


रवि समझ गया था कि यह खड़ूस निन्नायबे के फेर में पड़ा है और विभा की जवानी हेल्थक्लब जाकर कट रही है।
अगले दिन रवि जब आफिस से घर लौट रहा था तो उसकी पुरानी कार दगा दे गयी। रास्ते में एक चमचमाती लाल कनवर्टिबल कार फर्राटे से निकली। कार एक शोख लड़की चला रही थी। अचानक वह कार उससे कुछ दूर झटके से जाकर रूकी। रवि को दूर से वह लड़की पास आती दिखी। उसने बड़े ही भड़कीले कपड़े पहन रखे थे। उसके पास आते ही रवि पर बिजली गिरी। वह विभा ही थी। विभा? यहाँ? कनवर्टिबल कार में और इतने मादक अँदाज में। रवि के दिमाग में हजारो सवाल घुमड़ रहे थे। विभा ने पास आकर कहा "हाई रवि, कैसे हो? पैदल कहाँ जा रहे हो? तुम्हारी कार कहाँ है? पास ही रहते हो?" रवि के मुँह से विभा की सवालों की बौछार के जवाव में सिर्फ एक वाक्य निकला "विभा, तुम यहाँ कैसे?", विभा ने मस्ती से बाल झटक कर कहा "अरे, जहाँ मेरा घर, मेरा परिवार, वहीं मै। और कहाँ जाऊँ? खैर छोड़ो इन सवालो को। क्या तुम्हे लिफ्ट दे दूँ?" रवि के न कहते कहते विभा ने कार का दरवाजा खोल दिया। रवि भी अपने सवालो में खोया कार में जा बैठा।


विभा रास्ते में बताती जा रही थी कि कैसे जिस बहुराष्ट्रीय कम्पनी में वह काम करती थी वहाँ के बिजनेस मैनेजर से उसकी मित्रता हो गई। कैसे रवि की बेवफाई के झटके को सहने में उसने उसकी मदद की, कैसे उसकी कम्पनी ने एक अमेरिकन कम्पनी खरीद ली और वह दोनो अमेरिका आ गये। उस समय विभा की आँखे नम थी। अचानक उसे कुछ मजेदार बात याद आ गयी और वह खुश होकर रवि को अपने अमेरिका प्रवास के किस्से सुनाने लगी। विभा बीच बीच में शोख हँसी हँस रही थी और डूबते सूरज की लालिमा की चमक में उसके खुले बाल मादक होकर लहरा रहे थे। रवि की नजर न चाहते हुए भी विभा की नाभिदर्शना टीशर्ट पर जा रही थी। विभा ने रवि की चोर निगाहें पकड़ ली और मुस्कुरा कर कहा "रवि, मेरा घर नहीं देखोगे?" रवि ने मदहोशी में हाँ कर दी।


कार एक बड़े बँगले के सामने जाकर रूकी। अब तक रवि सोच चुका था कि वह वापस टैक्सी या बस से ही जायेगा, वह विभा को अपना फटेहाल अपार्टमेंट नहीं दिखाना चाहता था। विभा ने उसे सोफे पर बैठने का ईशारा किया और पूछा "क्या पियोगे?" रवि के सादा पानी माँगने पर वह हँस पड़ी, उसके हँसने से उसकी पेट की सुगठित माँसपेशियाँ मछलियों की तरह उछल रही थीं और रवि चाहे अनचाहे उसकी ओर से नजर नहीं हटा पा रहा था। विभा उसके लिए रेडवाईन और व्हाईट चीज लेकर आ गई। विभा उसकी ओर अर्थपूर्ण नजरों से देख रही थी। रवि वाईन पीते हुए विभा की नजरों का अर्थ पड़ने की कोशिश कर रहा था। अचानक विभा ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा "रवि, मेरे ऊपर एक अहसान करोगे?" रवि आँखें झुकाए ही बोल पड़ा, "तुम्हारा अपराधी हूँ जो चाहो सजा दो"। विभा ने कहा ऐसा न कहो, अब मुझे तुमसे कोई शिकवा नहीं। पर मैं अगर तुमसे कुछ कहूँ तो मना तो नहीं करोगे? रवि भला क्यों मना करता। विभा ने कहा " जरा अपनी शर्ट उतारो।" रवि को झटका लगा, कि कहीं विभा ने उसकी चोर निगाहें तो नहीं पड़ ली? कहीं वह भी तो वही नहीं चाहती जो मैं? एक तो वाईन की खुमारी, दूसरे मस्त डूबती शाम उस पर विभा की मादक अदायें, रवि का दिमाग काम करना बंद कर चुका था और उसने एक आज्ञाकारी यंत्रमानव की तरह विभा के कहे अनुसार शर्ट उतार कर पूछा "अब?" विभा "अभी आई" कह कर ओझल हो गई रवि को सवालों के पत्थरों पर अकेला सर पटकने को।


अपनी इस नीच सोच पर उसे गुरूर हो आया था। वह शीशे में खुद को देख रहा था और उसे अपनी आँखों के चारो ओर फैलते स्याह घेरों से डर लगने लगा।
रवि के दिमाग में अब सवालों के हथौड़े चल रहे थे, क्या विभा का पति कुछ ज्यादा मसरुफ रहता है? क्या विभा अपने पति से खुश नहीं? कहीं विभा का पुराना प्यार अमेरिका के स्वछंद वातावरण में बावला तो नही हो गया? क्या मै छाया को धोखा नहीं दे रहा? इसी उधेड़बुन में रवि की नजर अचानक सामने लगी एक आदमकद पारिवारिक तस्वीर पर चली गयी रवि मानों जमीन पर गिरा। यह उसके बास सुकुमार जयवर्धन रेड्डी की तस्वीर थी। वह उस शख्स से सख्त नफरत करता था। इस मनहूस शख्स के उसकी कम्पनी खरीदने के पहले उसकी जिंदगी कितनी बेहतरीन चल रही थी। मजे से पाँच घँटे काम, कम्पनी में हमेशा हल्का माहौल और खूब सारी सुविधायें। काम में कोई तनाव न होने की वजह से ही रवि ने लेखन का पुराना शौक भी फिर से अपना लिया था और पिछले साल के सर्वश्रेष्ठ ब्लाग लेखक का पुरस्कार भी जीता था। पर अब कमीने रेड्डी ने ईंटरनेट भ्रमण पर पहरे बिठा दिये, काम के घंटे बड़ा दिये और अब धीरे धीरे कंपनी का काम अपने चाचा भतीजों की हैदराबाद स्थित कंपनियों को आऊटसोर्स कर रहा था। रवि की नौकरी पर भी तलवार लटकी थी। अब रवि समझ गया था कि यह खड़ूस निन्नायबे के फेर में पड़ा है और विभा की जवानी हेल्थक्लब जाकर कट रही है। रवि ने मन से सारे अपराध बोध उतार फेंके। अब उसने सोच लिया था कि खुद को तनाव देने वाले रेड्डी से अब वह बदला लेकर रहेगा। विभा से प्यार का नाटक फिर से खेलेगा और यह प्यार रूहानी स्तर से गिरकर जिस्मानी भी हो जाये तो कोई गम नहीं। अपनी इस नीच सोच पर उसे गुरूर हो आया था। वह शीशे में खुद को देख रहा था और उसे अपनी आँखो के चारो ओर फैलते स्याह घेरो से डर लगने लगा।


अचानक विभा और बच्चों की आवाज से उसकी तंद्रा टूटी। सामने देखा तो विभा अपने दो बच्चो से उसके सींकिया अधखुले जिस्म की ओर इशारा करके कह रही थी "यहाँ आओ विपुल और नकुल। देखो, मैनें कहा था रोज हार्लिक्स पिया करो पर तुम लोग सुनते नहीं हो। अगर रोज हार्लिक्स नहीं पियोगे तो बड़े होकर इन अंकल की तरह कमजोर रह जाओगे।" उधर रवि जो अपनी बेखुदी में मानों वेगास के आसमान से तैर रहा था, उसके ख्यालों के गर्म गुब्बारे में विभा के इस पैंतरे का काँटा लगाऔर रवि धड़ाम से असलियत के रेगिस्तान में गिरा। रवि अकेले नहीं गिरा था, विपुल जो दौड़ता आ रहा था, उसके हाथ से एक चाकलेट का अधखुला पैकेट उछलकर रवि के वाईन के गिलास में गिरा और रेड वाईन के बेशुमार छींटे उसकी इकलौती सफेद कमीज पर। रेड्डी के आने के पहले वह हमेशा जींस टीशर्ट में ही काम पर जाता था। अब इस काले अंग्रेज रेड्डी ने ड्रेसकोड लगा दिया था और रवि आऊटसोर्सिंग के खतरे के चलते अपने कपड़ो पर ज्यादा खर्च नहीं कर रहा था। विभा के इस पैंतरें ने रवि को चारो खाने चित्त कर दिया था। फिर कब उसने बच्चों की शरारत के लिए माफी माँगी , कब बच्चों से परिचय कराया, कब उसे रेड्डी की टीशर्ट पहनने को दी और कब उसे अपनी लाल कनवर्टिबल कार में छोड़ने चल दी, रवि को पता ही नही चला। एक सन्निपात जैसा हो गया था उसे।


कार में विभा ने जब उससे रास्ता पूछा तो वह नींद से जागा। अब उसे एक और सवाल परेशान कर रहा था, जब वह अपनी भूतपूर्व मादक,उनमुक्त कपड़ो वाली माशूका के साथ दूसरी शर्ट पहने और हाथ में अपनी रेड वाईन लगी शर्ट का लिफाफा उठाये तीन घंटे देर से घर पहुँचेगा तो छाया को क्या जवाब देगा? यकीनन वह विभा के बच्चों के सामने हार्लिक्स का माडल बना, यह बताकर तो अपनी हुज्जत कराने से रहा। छाया, विभा के कँटीले अँदाज देखकर निश्चित ही उन दोनो के बारे में वही सोचेंगी जो रवि के मन में था और मन में ही रह गया।


[अंतिम अध्याय: लेखक ~ अनूप शुक्ला]

7 comments:

Vijay Thakur said...

बहुत खूब अतुल मियाँ, अच्छी कहानी बुनी जा रही है लगता है। वैसे मुझे व्यक्तिगत तौर पर अभी तक कहानी सपाट दिख रही थी लेकिन अब लगता है कुछ हो रिया है। वैसे विभा के किरदार को जमाने में थोड़ा समय देना चाहिये था और उसकी कुछ स्वभावगत विशेषताओं को उभारा जाना चाहिये था। उसे इस तरह से सीधे सीधे एक ट्विस्ट देकर अमरीका फेंक दिया गया है लगता है।

कहानी और रोचक बनेगी ऐसी उम्मीद आगे आने वालों से।

Jitendra Chaudhary said...

बहुत सही मिंया, सही जा रहे हो.
कहाँ से उठाया, क्या क्या सपने दिखाये,कहाँ तक उछाला और कहाँ ला पटका,
साम,दाम,दन्ड,भेद,ट्रेजडी,कामेडी,रोमान्स,छल,कपट,राजनीति,कूटनीति सब है यहाँ.
अतुल भाई की लेखिनी की यही तो खासियत है.

अभी एक बार पढा है, एक ही सांस मे....अभी दोबारा पढूँगा.

Debashish said...
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Debashish said...

अतुल भाई ने कहानी को जो सेक्सी मोड़ दिया है वह अचंभित कर देता है। रवि की शर्ट और खुमारी उतरने के ऐसे किस्से को कॉलेज के समय हम लोग KLPD होना कहते थे, अगर पर्याय ना जानते हों तो माफ कीजिए कम से कम मैं खुलासा नहीं कर सकता।

कहानी की उष्मा बनी रहे इस लिए मैंने बिना पूछे ही कुछ पैरा बना दिए, आशा है आप बुरा न मानेंगे। वैसे रवि का अपनी शिक्षिका के प्रति आकर्षण से "मैं हूँ ना" की सुश्मिता सेन याद आ गयीं। इंडिब्लॉगीज़ में ईनाम जीत चुके रवि कि कार्यस्थल से ब्लॉगिंग न कर पाने का दुःख मुझसे बेहतर कौन समझ सकता है ;)

Jitendra Chaudhary said...

देबाशीष भइया, कहानी के दूसरे भाग मे अतुल भाई के फोटो मे उनका चेहरा साफ नही दिख रहा है, जरा साफ चेहरे वाला फोटो लगाइये.

Dharni said...

कितनी अच्छी हिन्दी लिखते हैं। कभी सोचा नहीं था कि इंटरनेट पर इतनी अच्छी हिंदी उपलब्ध है।

nitin said...

maine is poori kahaani ko ek chote se chutkule mein suna tha bachpan mein.
nahi jaanta tha ki koi aisa bhi hai jo is sadharan se chutkule mein kitne bhav daalkar ek sunder se kahani racch sakta hai.
aaj is blog par pahli baar aaya hoon. subah ke 4:30 hue hai... kal phir aaoonga.
likhte rehna mitr.