Wednesday, April 20, 2005

दरकते आशियाने

"कामरान! अबे कामरान मेरी मोपेड का पंचर बनवाया कि नहीं।" गुसलखाने से पानी की धार के गिरने के बीच इशरत अली की फटे बाँस सी आवाज ने सवेरे का अलसाया सन्नाटा तोड़ा। "अरे कामरान है कहाँ, वह तो सवेरे ही निकल गया है मैच खेलने"। यह सबेरे का नाश्ता तैयार करती नसीबन की आवाज थी जिसके नसीब में अलसुबह चिमटे का दीदार ही मयस्सर था, चैन की नींद नही।


यह बकरमंडी की ढाल पर अपने पुरसाहाल को रोती हाजी मोईनुद्दीन की पचासी साल पुरानी हवेली में बने दर्जनो दड़बेनुमा कमरों में से एक, कमरा नं ५६ का, रोज सुबह दोहराया जाने वाला वाकया था। इशरत अली का कुलजमा पाँच बंदों का खानदान यहाँ रहता था। खुद एक प्राईवेट फर्म में मुनीमगीरी करने वाले इशरत अली, उनकी खातून नसीबन बानो, निकम्मा बेटा कामरान, बेटी पलक और इशरत अली की कानी माँ जरीना बानो। "या खुदा कब इस लड़के की अक्लदाड़ निकलेगी, पहाड़ी दुम्बे जितना मुस्टंडा हो गया है पर काम के वक्त हमेशा रफूचक्कर", इशरत अली चारखाने का तौलिया लपेटे बड़बड़ाते हुए गुसलखाने से निकले। इससे पहले की नसीबन आँखे तरेर कर अपने लड़के का बचाव करती, इशरत अली बड़बड़ाते रहे,


"अजी अब यह मत कहना कि अभी लड़का ही तो है। तुम्हारे चश्मे बद्दूर का न तो स्कूल कालेज में जी लगा न फजलू के पावरलूम की नौकरी में। खुदा जाने क्या करेगा? सबेरे शाम बल्ला घुमाने से क्या गावस्कर बन जायेगा?


"अब्बा यह गावस्कर के जमाने लद गये अब तो तेंदुलकर का जमाना है। "


यह इशरत की बेटी थी जो रोजाना होने वाली बिजली कटौती की वजह से लालटेन की पीली रोशनी में अपना होमवर्क निपटा रही थी और गाहेबगाहे माँ बाप की चखचख के बीच अपनी नुक्ताचीनी के बजरिये जिंदगी में खोयी हँसी ढूढती थी।

खैर इशरत अली को आज भी सूखे आचार और नसीबन की करेले सरीखी जुबान से निकले तानो के साथ अपने नाश्ते में अधजले परांठे निगलने थे। आज फिर उन्हे आठ सवारियों की जगह में बारह आदमियों के बीच ठूँसकर टेंम्पू में बैठना था। आज फिर रास्ते भर अपने नामाकूल लड़के को मन ही मन गरियाना था जो मुँह-अंधेरे उनकी दुलारी मोपेड लेकर क्रिकेट का मैच खेलने रफूचक्कर हो गया था। आज फिर उन्हें दुकान के मालिक के बीस साल के नौजवान बेटे से देर से आने बार गालियाँ खानी थी जो खुद बचपन में उनके सँग उँगली पकड़ कर दुकान से घर जाता था। आज फिर उस डाँट के बीच उस बीस साल की कंप्यूटर आपरेटर की फिच्च से निकलने वाली हँसी उनके दिल में नश्तर की तरह चुभने वाली थी।


"कुतर*दी।" इशरत अली के मुँह से उस कंप्यूटर आपरेटर के लिए टेंम्पू के धचको के बीच गाली निकली। "हाँय, यह गाली किसको दे रहे हो मियाँ?" टेंपो में उनके सामने बैठी एक मुटल्ली औरत चीखी। इशरत अली को इल्म हुआ कि सामने बैठी खातून समझी है कि उन्होने उसे गाली बकी है। एक पल में बखेड़ा खड़ा हो गया। हजार बार समझाने के बाद भी वह शैतान की खाला नही मानी। और तो और टेंम्पू वाला भी उस औरत का साथ देने लगा। इशरत अली को माजरा समझते देर न लगी। सामने वाली औरत बैकवर्ड क्लास की थी और टेंम्पू वाला भी। दोनो इशरत अली की अनजाने में मुँह से निकली गाली को खुद पर किया गया जातिगत हमला समझ बैठे थे और सरेआम इशरत अली की जूतम पैजार करने पर अमादा थे। इशरत अली अब उस घड़ी को कोस रहे थे जब वे खुद को ख्यालों मे खो गये थे। उनका दिल बराबर उनकी दुकान में काम करने वाली कंप्यूटर आपरेटर को लानते भेज रहा था।


इशरत अली को यह दिन भी देखना मँजूर था कि दुकान के मालिक ने तो उम्र भर इज्जत बख्शी, उन्होने भी कभी हिसाब में दो पाइ का फर्क न आने दिया। पर बदलते जमाने को हाय लग गयी थी। शैतान के घर से कंप्यूटर नाम की चीज आ धमकी थी। पल भर में महीनो के हिसाब का चिठ्ठा छाप देता था कमबख्त। कुछ उस कंम्पयूटर का जादू कुछ वह बेहया कंप्यूटर आपरेटर जिसकी वजह से दुकान के मालिक का लड़का उनके जैसे सभी पुराने काम करने वालो को चलता कर देने पर अमादा था। इशरत अली का खुद का लड़का कामरान कभी उनके कहे पर कान न देता था। बस सबेरे शाम एक ही धुन, दो नाटे कद के क्रिकेटरों ने टीवी से चिपके रहने वाले छोकरो पर न जाने कौन सा काला जादू कर दिया था कि सबेरे शाम सिर्फ बल्ले घुमाया करते थे।


वैसे पड़ोस वाले दर्जी खुर्शीद ने बड़ी वजन की बात कही थी उनसे "मियाँ, खुदा का शुक्र मनाओ कि लड़के क्रिकेट में मशगूल हैं, खुदा गारत करे इन मुफ्ती मौलवियों को जो पराये घर की आग से अपना ही घर जलाने पर अमादा है। अमाँ न जाने कौन से फिलीस्तीन और ईराक के मुआमलों के चर्चे गा गाकर पहले काश्मीर और अब गुजरात में दहशतगर्दी की ओर धकेल दिया हमारे लड़को को। मियाँ, इन अक्ल के अँधे लड़को से कोई पूछे कि गर ईंगलिस्तान में कोई किसी किताब में कुछ लिखता है तो तुम्हें अपने ही टाकीजों और बसों को सुपुर्दे खाक करने की क्या जरूरत है। " इशरत अली ने पूछा था कि "अमें खुर्शीद, तुम भी कहाँ कहाँ से चंडूखाने की खबर लाते हो। हाँ कल बड़े चौक पर लड़को ने बवाल किया था। पर मैं तो समझा था कि वे कालिज की बढ़ी फीस के खिलाफ आवाज बुलँद कर रहें हैं।" खुर्शीद ने उन्हे मानो गर्म रेत पर ला खड़ा किया था, वह बोला था " भाई इशरत, तुम भी यार आँखे बँद करके जीते हो। अमाँ यह लौंडे गर बड़ी फीस या बड़े तेल के दाम को लेकर हँगामा करे तो यह मुल्क कब का सुधर जाये, पर यह सब तो किसी रश्दी की किताब पे हल्लाबोले हैं। जिस किताब को न ये पढ़ सकते हैं, न इनके नुमाँया मुफ्ती।"


"अबे, क्या चू**पा है? क्यों गाली देता हैं औरतों को?" इशरत अली के कानो में पिघले सीसे के मानिंद थानेदार की आवाज पड़ी तो वे मानो नींद से बाहर आ गये।


[अगला अध्याय: लेखक ~ गोविन्द उपाध्याय]

16 comments:

deepshikha70 said...

atul ji...the way u have started this story is really very nice..but still i want to say few words...
(a) kahani mai starting point mai hi bahut sare patron ka parichay kahani se pathak ki pakar ko kamjor kar raha hai...
(b) sahitya{literature} samaj ka darpan[mirror] mana jata hai..isiliye shayad aapne jis low profile community ko depict karne ka prayas kiya usme isitarah ki harsh language use hoti hogi..still antim panktiyon mai jo 'gali' aapne likhi hai usko replace karsake toh achcha lagega.
(c)simile ke liye atihasik patron ka chayan theek rehta hai...if possible 'mayavati' ke naam ko replace karke koi appropriate atihasik patr dalsake toh achcha rahega...

regards

deepa

Jitendra Chaudhary said...

भइया कहानी तो चकाचक है,
लेकिन शीर्षक कतई नही सूट करता,
ये शीर्षक रखा किसने है?
अमां अतुल भाई, पूरी कहानी उर्दू मे लिखे हो शीर्षक लिखते समय हिन्दी, संस्कृत की घुट्टी कहाँ से पी ली? इसको ठीक करो भई.

अब रही बात दीपा जोशी के कमेन्ट्स की तो भई, दीपा जी, ये भाषा कानपुरी है, जो शब्द चू**पा यहाँ प्रयोग हुआ है ना, वो वहाँ एक एक बन्दा बोलता है, इसलिये ये गाली से उठकर बोलचाल की भाषा मे शामिल हो गया है, फिर भी शायद देबू ने आपकी बात मान ली है. रही बात पात्रों के परिचय की, अतुल भाई बहुत माहिर है, पात्रों को भटकने नही देते, फिर भी अब ये अतुल भाई की कहानी है, उनकी मर्जी चलेगी.मै कुछ नही कह सकता.

deepshikha70 said...

jitu ji aap sahi kehrahe hai...kanpuri bhasha mai esse shabd ek aam bolchal ka hissa hotey hai..still sir, i believe kahani ki vishayvastu jo bhi ho sheli ka chayan karte samay ye dekhna bhi jaroori hai ki 'reader group' kaun hai...maine jo kuch bhi express kiya voh as a reader tha...not as a critic[ i stand no where]...
After reading atul ji's story i do agree atul ji writes very well...

regards
deepa

Atul Arora said...

आप सबकी सलाह सिर आँखो पर| जीतू भाई , शीर्षक बदल दिया है| पहले वाली भी इसी नाचीज ने रखा था| देबू भाई ने पहली ही आपत्तियों का निराकरण कर दिया है अतः उनको शुक्रिया| दीपा जी, मै यथासंभव अपशब्दों के प्रयोग से बचता हूँ| तमाम तथाकथित प्रगतिशील कथाकार आधुनिकता या यथार्थ के नाम पर गालीगलौज या नँगई का खुल्लमखुल्ला प्रयोग करते हैं और उस विषय के पक्ष विपक्ष में काफी कागज काले किये जा चुके हैं| मैने जो शब्द उपयोग किये थे उन्हे आप अमेरिकन अँदाज में कनपुरिया स्लैंग कह सकते हैं, वैसे जिन शब्दों को हमारे कानपुर लखनऊ का समाज अपशब्द मानता है वही शब्द अलीगढ और मुज्जफरनगर में घरों में इस्तेमाल होते हैं| रही बात कहानी में शुरू में अधिक परिचयों की तो मैं कोई साहित्यकार नहीं सिर्फ एक साहित्यकार का बच्चा हूँ, अतः दीपा जी इसलिए ऐसी त्रुटियों होनी स्वभाविक हैं पर आप सबकी सलाह से सुधर जाऊँगा| आप सबके सुझावों के लिए हार्दिक धन्यवाद|

Raman Kaul said...

अतुल, कहानी पढ़ कर मज़ा आ गया। कहानी का प्रवाह बहुत बढ़िया है, देखें आगे क्या होता है। कहानी में प्रयुक्त भाषा (एकदम वास्तविक बोलचाल की उर्दू) ने तो बहुत ही .. (सही शब्द नहीं मिल रहा) .. प्रभावशाली है।

Debashish said...

दरअसल बुनो कहानी में कोई नियुक्त संपादक नहीं है। लेखक को क्रियेटिव फ्रीडम होनी चाहिये जो चाहे कहे। मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि मैंने सारा संपादन संशोधन दीपा जी के लिखने के काफी पहले कर दिया था। जब पोस्ट सेव की तो दीपा जी की प्रतिक्रिया देखी। अगर शब्दों से किसी को आघात लगा तो दोष मेरा है। अतुल, अभी तो कहानी में प्रवाह नहीं आया है, पर शुरुवात बेहद अच्छी है। अगले लेखक पर निर्भर है कि कैसा मोड़ ले ये गल्प। दीपा जी, आप भी हैं कतार में!

Jitendra Chaudhary said...

चलो भई, सारे सवालों का समाधान तो हो ही गया है, अब ये बताओ, कौन लिख रहा है, कहानी,

कहानी कोई भी लिखे, शैली उर्दू होनी चाहिये, ताकि कहानी की निरन्तरता पर आँच ना आये, चाहे तो शैली के लिये अतुल,रमण या मुझ नाचीज़ से सलाह ली जा सकती है.

अनूप शुक्ला said...

ठीकै है.बढ़िया .पर बकरमण्डी वाले इतने सबेरे खुलने वाले आफिस में नहीं जाते कि बिटिया होमवर्क लालटेन में करे.गाली-गलौज के बारे में यही लगता है कि ** लगे शब्द ज्यादा अश्लील लगते हैं.कहानी की शुरुआत की तारीफ करते हुये यही लग रहा है कि अतुल ने थोड़ा कम लिखा. लगता है कि संपादकीय (निरंतर)दायित्व के चलते और उड़ान नहीं भर पाये या फिर इतना अच्छा लिखा कि लगता है कि और लिखना चाहिये था.बहरहाल.बधाई .अब आगे लिखे कोई नहीं तो श्रीमान नाचीज (जीतेन्द्र)तो हैं ही.दीपशिखाजी आप ही लिखिये.

Atul Arora said...

अनूप भाई , अगर मैं ज्यादा लिखता तो बाकियो के लिए क्या बचता? सच मानिए, कई दिन से बस यही घूम रहा था कि लिखना है बुनो कहानी पर क्या यह नही सूझ रहा था| एक शाम बस पहला प्लाट जो सूझा तो सारे किरदार और वाक्ये एक दूसरे का हाथ पकड़े कहानी पर उतरते चले गये और बीस मिनट मे यह सारा किस्सा बखान हो गया बिना काँट छाँट के| मालुम पड़ता है रवि भाई की गजल बनाने वाली मशीन का कोई संवर्धित संस्करण हाथ लग गया हो| सच मानिए कहानी लिखने बुनने से कभी दूर दूर का नाता नही रहा है, सिर्फ पिताश्री को देखा है बचपन में, रविवार की गुनगुनी धूप में चटाई पर बैठे क्रियेटिव मोड में| जब दीपा जी की प्रतिक्रिया देखी और जीतू की हड़काई बाकी लोगो को कि लिखो तो ऊर्दू में और दिक्कत हो तो खुद जीतू ,रमण या मुझसे पूछो तो लगा कि स्पष्टिकरण देना जरूरी हो गया है अब| संतजनो न मुझे ऊर्दू आती है न कभी कहानी लिखी है, जैसे बिना गुरू से सीखे अरूण बख्शी कभीकभार गाना गा लेते हैं फिल्मो में, वही हालत अपनी लेखन के क्षेत्र में है| जो कुछ इस खुराफाती खोपड़ी में सूझता है बस उतार देता हूँ ईंटरनेट के पन्नो पर| ऊर्दू के शब्द शायद अपनी गँगाजमुनी संस्कृति की बोलचाल में समाहित है ईसलिए खुदबखुद जुबान पर आ जाते है पर गजल और शायरी के नाम पर सच में बुखार आ जाता है| वैसे एक बात तो है,रोजनामचा पर जब मसखरी लिखता हूँ तो हिट होती है, जब कुछ सीरियस लिखूँ तो मामला पिट जाता है| जब कभी भी इस तरह के शगूफे हिट होते हैं तो अपनी ही पीठ ठोंकने का मन होता है| इस कहानी को लिखते समय एक बार लालच आया कि यार खुद ही पूरी क्यो नहीं लिख देता| फिर सोचा कि मैं ही क्यो अपने मियाँ मिठ्ठू बनूँ , ब्लागदल में बड़े बड़े कहानीकार हैं , वे इस कहानी को सही अँजाम देंगे , ईसलिए इसे यहीं छोड़कर एक नये शेखचिल्लीटाईप आईडिया को रोजनामचा पर उतारने की सोच रहा हूँ, देखें हिट होता है या पिटता है| टेंपो वाले प्रकरण से मामला हास्यपरक भी हो सकता है , संवेदनशील भी सिर्फ लिखने वाले की तबीयत पर है|

Tarun said...

कहानी की शुरूआत तो अच्‍छी है, बस एक बात मै भी कहना चाहूँगा कि कहानी मे जिस तबके के
किरदार है उस हिसाब से गालियों का इस्‍तमाल तो होना ही चाहिये। क्‍योंकि उनके बोलचाल मे यह आम है। अतुल ने बहुत सही शुरूआत की है।

अगर मुझ नाचीज को भी आप लोग इस दौड़ मे अपने साथ शामिल कर लें तो यह रूकी (Rookie) भी कुछ सिख जायेगा। अपने जाल मे आप लोगों की इस दौड़ के लायक बनने का प्रयास जारी है।

Atul Arora said...

तरूण आप देबू को मेल लिखिए, वे आपको मँडली में जोड़ देंगे।

Tarun said...

अगली कड़ी कब आयेगी।

धरणी धर द्विवेदी said...

Oh my god! There is so much great hindi stuff on the web and I never knew of it..I was thinking until now that I'll stary something!! Kitne mahaan mahaan lekhak hai hindi ke america mein. Atul ji kya baat hai! Main new jersey mein hoon. Hamesha sochta tha ki hindi bolne waale kam hain america mein..lekhak kahaan se aayeinge.Kya mast hindi/urdu likhte hain aap सब लोग ।दिल खुश हो गया

shobhna said...

hey! i have been trying to get the hindi fonts setup for my blog. please let me how u set it up.

इंद्र अवस्थी said...

bahut badhiya kahanee rahee

RAJESH KUMAR said...

बेहद अच्छी शुरुआत पर कहानी कुछ खो सी गई।

राजेश