Friday, January 21, 2005

अध्याय ३ : और भी गम हैं जमाने में...

[कहानी का खात्मा मुझे करना था। पर इस काम के लिये मुझे उपयुक्त लगे गोविंद उपाध्याय। गोविंदजी की लगभग २०० कहानियां विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। काफी दिनों से लिखना बंद सा है। न लिखने के लिये चर्चित कथाकारबिहारीजी इन पर झल्लाते रहते हैं वहीं अमरीक सिंह 'दीप' लिखने के इन्हें फुसलाते रहते हैं। हमने कुछ नहीं किया सिर्फ हिन्दी के चिट्ठे पढाते रहे। "बुनो कहानी"के पहले दो अंक दिये तीसरा अंक लिखने को। देखें क्या कहते है गोविंद कहानी के बारे में|
- अनूप शुक्ला
]


[गतांक से आगे]


रवि का अपार्टमेन्ट आ गया था। कार पार्किंग में एक हल्के से हिचकोले के साथ रुकी। रेडवाइन का नशा अब पूरे शबाब पर था। पूरे रास्ते रवि के दिमाग में बस यही था कि वह का सामना कैसे करेगा। । तीन घन्टे उसने कैसे बिताये...सब कुछ बताने के बाद भी क्या छाया उसकी बातों का विश्वास कर लेगी! उसके मन में ख्यालों का ऐसा मिश्रण था ,जिसके बीच कुछ भी साफ नहीं था -- सब कुछ गड्ड-मड्ड। रास्ते भर कार में हिना की मादक खुशबू, बेंगा ब्वायज का भड़काऊ संगीत तथा विभा का चमात्कारिक व्यक्तित्व उसे कुछ ज्यादा सोचने भी नहीं दे रहा था।


"सारी यार..थोड़ा भटक गया था", रवि झेंपते हुये बोला, "..सारी जिंदगी भटकते हुये बिता दी। न भटकन खत्म हुयी न मंजिल मिली"।
अमूमन छाया और रवि साथ-साथ आफिस आते-जाते थे। आज उसे एम्बेसी में कुछ काम से जाना था। छाया खामख्वाह बोर होती इसलिये वह अकेला ही निकल पड़ा और फिर कार का खराब होना अगर दुर्घटना मान लें तो विभा से वर्षों बाद मिलना एक सुखद संयोग था। पर वर्षों पहले की विभा और इस विभा में कितना अंतर था। भले ही वह उसकी पत्नी न बन पायी हो पर मन के किसी कोने में एक कोमल भावना तो थी ही उसके प्रति। और विभा स्वयं उसका कितना ख्याल रखती थी। उसकी किताबों से लेकर कपड़ों तक, "बहुत लापरवाह हो तुम! पता नहीं सलीके से रहना कब सीखोगे"... रवि के सामान को सहजते हुये विभा अक्सर उसे झिड़कती, "क्या अंदर ही सोये रहने का इरादा है जनाब का..", विभा की खनकती आवाज ने उसे ख्यालों की दुनिया से वर्मान हकीकत तक वापस लौटाया। "सारी यार..थोड़ा भटक गया था", रवि झेंपते हुये बोला, "..सारी जिंदगी भटकते हुये बिता दी। न भटकन खत्म हुयी न मंजिल मिली"। रवि तय नहीं कर पाया कि विभा यह खुद से कह रही है या रवि से। उसकी हंसी उड़ा रही है या अपनी सुना रही है। विभा की आवाज किसी गहरे कुयें से आती महसूस हुयी। अचानक बहुत पहले सुनी कविता याद आ गयी उसे:


सत्य कभी था आज सत्य ही सपना लगता है
बहुत सताता है यह लेकिन अपना लगता है
जानबूझकर कृत्य किये कुछ हुये अजाने में
सजा यही क्या कम,हारे तुमको हरजाने में
कौन गवाही दे उजड़े हैं गांव गवाहों के
हमें उमर भर संग रहना है इन्हीं गुनाहों के
जनम-जनम भर संग रहना है इन्हीं गुनाहो के।


रवि कार से बाहर निकला। "अच्छा रवि..", कहते हुये विभा ने अभिवादन की मुद्रा में विदा के लिये हाथ हिलाया।
"अरे यह क्या विभा? मेरे गरीबखाने तक चलो तो सही"
"सोच लो!! तुम्हारी पत्नी को कहीं एतराज न हो। कहीं तुम्हारा हफ्ता न खराब हो जाये", विभा अपनी दायीं आंख को हल्के से दबाकर खिलखिलायी। रवि ने एक चुभती सी नजर विभा पर डाली। इसमें कोई शक नहीं कि वह रवि का उपहास करते हुये चुनौती उछाल रही थी। वह नजर अंदाज कर गया विभा की इस अदा को। विभा उसके वर्तमान बॉस की पत्नी है, इस अचानक उठे सच ने तमाम स्वाभाविक जवाबों के सर कुचल दिये।


"नहीं विभा ,ऐसा नहीं है। वह बहुत समझदार औरत है", रवि ने सहज होने की कोशिश की।
"हां सो तो होगा ही। कोई मामूली सोच वाली औरत तुम्हारी पत्नी कैसे हो सकती है।" विभा के शब्द फिर उसे कैक्टस की तरह चुभते लगे।
रवि को खामोशी तोड़ते हुये विभा चहक कर बोली। "ठीक है बाबा मिल लेते हैं मिल लेते है उस महान औरत से जिसे आपकी अर्धांगिनी होने का गौरव प्राप्त है। "रवि को देखती विभा की मादक मुस्कान ने माहौल के तनाव का कामतमाम कर दिया।


रवि ने घंटी बजायी। छाया उसका बेताबी से इंतजार कर रही थी। "अरे तुम भी अजीब इंसान हो। इतनी देर कर दी। न फोन न कोई सूचना। बता देते। मुझे चिंता हो रही थी। मोबाइल भी आफ था तुम्हारा। कहां रह गये थे", सवालों की झड़ी लगा दी छाया ने। अचानक छाया की नजर विभा पर पड़ी। उसके शब्द ठहर से गये। मुंह आश्चर्य से खुला रह गया। क्षण भर के लिये उसके चेहरे के भाव बदले। असमंजस आया पर फिर तुरंत वह आश्चर्य मिश्रित उत्साह से बोली, "अरे मिसेज रेड्डी! वाह! सुखद आश्चर्य। नमस्कार...स्वागत है आपका", विभा ने गर्मजोशी से जवाब दिया, "नमस्कार छायाजी, मैंने कहा था न आपसे कि कभी आऊंगी आपके घर। आ गयी। लेकिन यह सच है कि मैने यह वायदा अनजाने में निभाया। पर इसके लिये भी मैं दोषी नहीं। सारा दोष आपके मियांजी का है। मुझे पता नहीं था कि यह आपका घर है। मि.रवि की कार खराब हो गयी थी रास्ते में इसलिये इन्हें लिफ्ट देनी पड़ी।" विभा की नजर रवि की तरफ भी पड़ी।
"अरे आप आइये भी तो। किसी बहाने तो आप आयीं -- अनजाने में ही सही..." छाया विभा को लगभग बाहों में थामें हुये ड्रॉइंगरूम में ले आयी। पीछे-पीछे रवि था। उसका रेडवाइन का नशा कभी का दम तोड़ चुका था। वह तो कुछ और ही स्थिति की कल्पना करके अपने को जवाब के लिये तैयार कर रहा था। पर यहां तो मामला एकदम नये रूप में था। वह सवालों की दुनिया में विचरने लगा। छाया विभा को कैसे जानती है। कब से जानती है। क्या दोनों पुरानी सहेलियां हैं। लेकिन बातों से तो नहीं लगता।


कयासों के समंदर में गोते लगाते हुये वह छाया-विभा की बातें सुनने लगा। उसका पूरा शरीर कान हो गया। तभी विभा की खिलखिलाती आवाज उसके कानों में टकरायी-"छाया, बड़ा होल्ड है भाई तुम्हारा अपने पति पर। आते ही दम देना शुरु कर दिया। "
"नहीं मैडम ,ऐसी कोई बात नहीं। दरअसल इनकी मां इंडिया से तीन बार फोन कर चुकी हैं। इनका कोई ट्रेस ही नहीं मिल रहा था। इसीलिये थोड़ा चिंता थी...खैर छोड़िये इन बातों को। क्या लेना पसंद करेंगी?", छाया ने उठते हुये कहा।
"कुछ नहीं। कुछ भी नहीं। कोई औपचारिकता नहीं। अभी जल्दी में हूं। रात काफी हो गयी है। फिर कभी"
विभा चलने के लिये उठी। छाया पहले से ही खडी थी। रवि भी उठ खडा हुआ। सारे प्रकरण में वह खामोश रहा। विभा ने फिर आने का वायदा किया और फ्लैट से बाहर निकल गयी। छाया भी उसे पार्किंग तक छोडने गयी। रवि के पैर असमंजस कि स्थिति में दरवाजे की तरफ अनायास बढे तब तक के शब्दों "जब तक मैं मैडम को छोड कर आती हूं तब तक तुम फ्रेश हो लो..." ने उन पैरों में ब्रेक लगा दिया। रवि बालकनी में आकर खडा हो गया।


नियॉन की रोशनी में पार्किंग की तरफ जाती दोनों महिलायें साफ दिख रही थीं। दोनों में कितना अंतर था। विभा लंबी, छरहरी, हल्का गेहुंआ रंग, 'स्लिम-ट्रिम'। जैसे भारत या अमेरिका किसी हेल्थ क्लब की कारसाजी हो। सारा शरीर नाप-तोलकर तराशा हुआ...दूसरी तरफ छाया का गोरा जिस्म जो काम-काज और घर-बार के पहियों के बीच संतुलन बैठाते हुये अपना लावण्य खोता जा रहा था। शरीर चतुर्दिक विकास की तरफ अग्रसर। एक की चाल में मादकता है तो दूसरी में एक मस्ती। बेलौस, सतुष्ट - बनावटीपन से दूर। तभी दोनों किसी बात पर खिलखिला उठीं। बालकनी में खडे रवि को लग रहा था कि दोनों उसी के बारे में बातें कर रहीं हैं। कार पार्किंग से निकली। छाया फ्लैट की तरफ वापस हो चली...वही मस्त चाल। गजगामिनी जैसी।


रवि, मैं एक औरत हूं। औरत की 'केमिस्ट्री' तुमसे बेहतर समझ सकती हूं। एक औरत से प्यार का निर्वाह तुम तब न कर पाये जब कर सकते थे तो अब कैसे कर पाओगे।
रात काफी हो चुकी थी। मनन सो चुका था। छाया सवेरे की तैयारी में लग गयी। सुबह काम का दबाव इतना ज्यादा रहता है कि कुछ काम रात में ही निपटाने जरूरी हो जाते हैं। खाना रोज ताजा बनता है। इसके लिये जितनी तैयारी रात में हो जाती है सबेरे उतना ही ज्यादा सुकून लगता है। रवि को 'फास्ट फूड' से एलर्जी है। मनन को भारतीय खाने पसंद हैं। छाया बेडरूम में घुसते ही बोली---"मां से बात कर ली न? कोई खास बात थी क्या?"
"हां कर ली। कोई खास बात नहीं थी। काफी दिन से बात नहीं की थी। कल कोई बुरा सपना देखा था सो परेशान थी हाल जानने को", टी.वी के रिमोट से खेलते हुये रवि बोला। "मैने तुम्हारी शर्ट और मि.रेड्डी की टी शर्ट धो दी है। सुबह मैं आफिस थोडा लेट जाऊंगी...मनन के स्कूल जाना है। कल कार नही रहेगी। शाम तक मेकेनिक दे जायेगा, अगर कोई बडी खराबी ना हुई तो। तुम आफिस समय से पहुंच जाना। नया बास कुछ स्टाफ सरप्लस करने की बात कर रहा था किसी से। छोटी-छोटी बातों पर हमें ध्यान देना पडेगा। मुझे लगता नहीं कि यह कम्पनी ज्यादा दिन खिंच पायेगी। कोई नया जॉब देखते रहना चाहिये। कम से कम एक का तो जॉब बना रहे।"


रवि छाया की तरफ देख रहा था। वह बड़े बुजुर्गों की तरह उसे समझा रही थी। नाइट बल्ब की रोशनी में उसका चेहरा काफी गंभीर लग रहा था। पिछले दस वर्षों में रवि ने कई फर्में छोड़ी थीं। छाया ने भी दो जगह काम किया था। वह इस समय मार्केटिंग का काम देख रही थी। फर्म के कारोबार से ज्यादा वाकिफ थी। लेकिन इसके पहले इस बारे में कुछ बात नहीं हुई। रवि सोचने लगा कि क्या वह विभा से मिलने के बाद का उपजा ज्ञान है या फिर सचमुच फर्म की हालत खस्ता है जिसके बारे में छाया उसे सावधान कर रही है। रात के ग्यारह बज चुके थे। छाया ने उसके घंघराले बालों में हाथ फेरते हुये कहा,"...पर घबराने की कोई बात नहीं। घबरायें वे कमजोर हों। बाजारवाद में तो ये स्वाभाविक झटके हैं। सालों से झेल रहे हैं हम। कुछ ऐसे तो हैं नहीं कि रस्सी टूटी धड़ाम हो जायें। कहीं कोई सहारा नहीं। हमारे पास मजबूत डोर है। मां बाबूजी अभी भी यही चाहते हैं। हमारे वापस घर लौटने का विकल्प, जिसे हम साल दर साल टालते आ रहे हैं, तो अभी भी खुला है।
"तुम्हें क्या हो गया है छाया? कैसी बातें कर रही हो तुम आज। तुम्हारी सोच तो कभी इतनी पलायनवादी नहीं रही। हम जायेंगे यहां से घर पर मजबूरी में नहीं।", एक गहरी नि:श्वास के साथ रवि ने अपने हाथ छाया के होंठों पर रख दिये। उसके हाथ छाया के बाल-गाल सहलाने लगे।


छाया ने अपनी आंखें रवि की आंखों में गड़ा दीं। उसकी आखें आज भी उतनी ही गहरी, सुंदर कशिश भरी थी। तमाम तनावों से मुक्त रवि उनमें तैरने-डूबने लगा। छाया का चेहरा झुका। वह रवि के कानों के पास, बिल्कुल पास आ गया। "रवि, मैं न पलायनवादी हूं न ही कमजोर। लेकिन मैं तुमको जानती हूं। तुम बहुत भावुक हो। बहुत जल्दी 'डिप्रेस' हो जाते हो। मैं किसी भी हालत में तुमको परेशान नहीं देखना चाहती। नहीं देख सकती। कोई जरूरी नहीं कि जैसा मैं कह रही हूं वैसा ही हो। पर हमें कठिनतम समय के लिये हमेशा तैयार रहना चाहिये। वी शुड बी प्रिपेयर्ड फॉर द वर्स्ट। परेशानियां पूछ कर नहीं आती।"
"कहीं तुम विभा को लेकर तो नहीं परेशान हो गयीं?", अनायास रवि के मुंह से निकले शब्द हवा में बिखर गये। कमरे में कुछ देर सन्नाटा पसरा रहा। केवल घड़ी की टिक-टिक और सांसों की आवाज सुनी जा सकती थी।


छाया ने अपना चेहरा उठाया। रवि की आंखों में झांकते हुये बोली। "मेरे परेशान की कोई बात नहीं। हां जब तुमने पूछा ही है तो सुनो। अगर तुम विभा के बारे में कुछ सोच रहे तो तुम गलत दिशा में जा रहे हो। विभा तुम्हारे जीवन का सिर्फ अतीत है। भूतकाल। ऐसा भूत जिसे तुम दस साल पहले हिंदुस्तान में छोड़ आये हो। एक छोटे कस्बे में दफन कर आये हो। रवि, मैं एक औरत हूं। औरत की 'केमिस्ट्री' तुमसे बेहतर समझ सकती हूं। एक औरत से प्यार का निर्वाह तुम तब न कर पाये जब कर सकते थे तो अब कैसे कर पाओगे। तब तुम उसकी पहुँच से बाहर थे और अब वह तुम्हारी पहुंच से बाहर है। प्यार निभाने के लिये जो बेवकूफी चाहिये वह तुममें उस समय नहीं थी। तुम समझदार बन गये। समय ने झटकों ने उसे भी समझदार बना दिया होगा। वह रेड्डी को छोड़कर तुम्हारे पास आने से रही। और रही बात देह की तो जीवन में देह ही सब कुछ नहीं होती। न ही उसके लिये सारे वैभव को कोई दांव पर लगा सकता है। तुम दोनों उस हालात से बहुत दूर आ चुके हो।"


रवि अवाक था। छाया ने पर्दे के दूसरी तरफ की हकीकत सामने रख दिया था। जो सच था। एक नंगा सच। इसके पहले कि बेडरूम विचारों की इस आंधी में कब्रिस्तान में बदलता, छाया कि खिलखिलाहट ने कमरे को फिर से जिन्दा कर दिया। "क्या हो गया मेरे प्यारे पति देव? इतना गंभीर होने की कोई जरूरत नहीं है। अरे भाई, विभा तुम्हारी क्लासफेलो रही होगी। दोस्त हो सकती है या फिर नई-नई आई जवानी की महबूबा। जिससे तुमने खूब ढेर सारी साथ जीने मरने की फिल्मी मुहब्बत वाली कसमें खायीं होंगी। आखिर तुम ऐसे शहर, कस्बे में रहे। लेकिन अब वह सब कुछ पीछे छूट गया। कोई प्रासंगकिता नहीं उसकी सिवा एक खूबसूरत अहसास के। एहसास इसीलिये खूबसूरत होते क्योंकि हम उनका होना नहीं देख पाते। बस हमें यह ध्यान रखना है कि वह हमारे बॉस की बीबी है, जिसे नाराज करना हम अफोर्ड नहीं कर सकते।"
"यार तुम्हें समझाना आसान नहीं है", रवि ने खीझने का नाटक किया। वह इस बात से हल्का महसूस कर रहा था कि छाया ने सारी बातों को इतनी सहजता से लिया।
"तो तुमको कह कौन रहा है समझाओ। बस आंखे बंद करो। सो जाओ। खो जाओ सुंदर सपनों में। क्या पता सपने में मुलाकात हो जाये।", छाया ने चुटकी लेते हुए कहा।
"लेकिन मुझे नींद नहीं आ रही है", रवि किसी बच्चे की तरह तुनकते हुये बोला।
"तो नींद के लाने के लिये अपने दस सालों से आजमाये नुख्से को क्यों नहीं आजमाते।", और छाया की खिलखिलाहट फिर कमरे में तैर गयी। इस खिलखिलाहट में मादकता ज्यादा थी या आमंत्रण यह जानने की कोशिश रवि ने नहीं की।

[इति]

13 comments:

Atul Arora said...

अनूप भाई
कहानी का ईससे सुंदर और सटीक अंत नहीं हो सकता था| आपने शुरू में दो अग्रगण्य लेखकों का जिक्र किया है जो कानपुर से ताल्लुक रखते हैं| अमरीक सिंह जी, राजेन्द्र राव साहब और तमाम अन्य लेखक भी कानपुर की ही शान हैं और जनवादी लेखक संघ के दिनों में अति सक्रिय रहे हैं| मैं नाम जोड़ना शुरु करूँ तो सूची लंबी हो जायेगी| पर शुक्ल जी ,आपके लिए एक नाम पहेली बूझने को छोड़ देता हूँ, जोंक, उपहार ईत्यादि लिखने वाले लेखक श्रीनाथ जी भी कानपुर के ही हैं ,आप जानते हैं क्या? अमरीक सिंह जी और राजेन्द्र राव साहब ईस मामले में मदद कर सकते हैं|

मिर्ची सेठ said...
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मिर्ची सेठ said...

शुक्ला जी कमाल कर दिए हो। मेरी प्रतिक्रिया जरा लम्बी थी इसलिए यहाँ जाइएपंकज

Jitendra Chaudhary said...

बहुत सुन्दर, काफी अच्छा लेखन, कह सकते है जस्टीफाइट ट्रीटमेन्ट.
एक अच्छा अन्त, लेकिन ना जाने क्यों लग रहा था कि कहानी खत्म ना हो, यूँ ही चलती रहे.......खैर दूसरो को भी तो मौका देना है, इसलिये .... अब दूसरो को भी सुनना चाहिये.

तो भाई लोग तैयार है ना आप लोग.

अनूप शुक्ला said...

अरे भाई,ये कहानी लिखी गोविंद उपाध्याय ने.हमें काहे दोष दे रहे हो अच्छे खराब खात्में के लिये.वैसे गोविंदजी बहुत उत्साहित हैं बहुत दिन बाद लिखने का काम शुरु कर के. वे लगातार चिट्ठे पढ़ते रहे लगभग सबके.उनका पहला कहानी संग्रह 'पंखहीन' जल्द ही छप के आने वाला है.

मैंने सिर्फ टाइपिंग का काम किया है.एकाध लाइन जोड़ी-घटाई है तथा कविता ठेल दी बीच में.उतना अपराध स्वीकार करने को तैयार हूं.

अतुल,जिन श्रीनाथ जी की बात बताई तुमने वे तीन-चार साल पहले रिटायर हुये.गोविंदजी उनकी कहानियों के बड़े मुरीद हैं.'दधीचि की हड्डी' बहुत प्रसिद्ध कहानी है उनकी. राजेंन्द्र राव शायद जागरण ग्रुप के पुनर्नवा से जुड़ने वाले हैं.

जीतेन्दर बाबू,कहानी तो अभी भी खुली है.चले जाओ रेड्डी की 'टीशर्ट' लौटाने.पर पूंछ के जाना घर में.हर बीबी छाया नहीं होती.

Atul Arora said...

अनूप बाबू मुझे मालुम था ,आप इसी जानकारी के साथ लौटेंगे| चलिए कुछ खुलासे और करता हूँ| श्रीनाथ जी की कहानी उपहार भी शायद जल्द नजर आये अभिव्यक्ति पर| दधीचि का अंत पर किसी एनएफडीसी के पासआउट उठाईगिरे ने बिना उनकी अनुमति लिए कुछ साल पहले टेलीफिल्म भी बना डाली| खैर वह मामला पुराना है| आप सोच रहेंगे होंगे मैं यह सब कैसे जानता हूँ, जनाब बचपन में कई कथाकारों को अपने घर पर देखा है जब वे कथा गोष्टी में आते थे| मान्यवर, श्रीनाथ जी का पूरा नाम श्री श्रीनाथ अरोरा है और यह खाकसार उन्हीं का पुत्र है|

अनूप शुक्ला said...

वाह मियां खाकसार.बधाई.खूब रोशन कर रहे हो पिताजी का नाम.अभी तमाम पुरानी बातें बताई गोविन्दजी ने तुम्हारे पिताजी के बारे में.बता रहे थे कि कहानी बुनने की कला का कानपुर में कोई जोड नहीं था उनका.बहुत दिनों से उनसे मुलाकात नहीं हुई उनकी.'दीपजी'को आज दिन भर खोजा गया 'तुम्हारा' घर का पता पाने के लिये पर वो कहीं नदारत थे.अब तुम्ही बता दो ताकि हम उनसे मिल लें.बहुत-बहुत बधाई'इन्डीब्लाग अवार्ड ' पाने के लिये.मेरा वोट बेकार नहीं गया.

Raman Kaul said...

कहानी बहुत ख़ूबसूरत तरीक़े से हैपी एण्डिंग के साथ अंजाम हुई है। प्रश्न यह है कि वास्तविक जीवन में आप को कितनी "छायाएँ" मिलेंगी। एक सुझाव है -- इस कहानी को "अभिव्यक्ति" या किसी कागज़ी पत्रिका में छपने को भेजा जाए। इस तरह का साझा लेखन शायद अपने आप में अपूर्व और अनूठा होगा, जिसे सही प्रचार मिलना चाहिए।

(पुनश्च : गोविंदजी का परिचय पढ़ने और कहानी के अंत में "इति" देखने के बाद भी जाने मुझे क्यों पहले यह कन्फ्यूजन रहा कि यह तीसरा भाग अनूप जी का है और अंतिम भाग गोविंदजी का अभी आना है।)

आशीष said...

आप भी हैप्पी एन्डिंग कर गये यश चोपड़ा और करन जौहर की तरह। सही लिखा है।

अनूप शुक्ला said...

यह संयोग रहा कि कहानी शुरु करने से लेकर खात्मे तक कनपुरियों के हाथ में रही .क्या किया जाये !आगे चर्चा देखें पंकज के चिट्ठे पर

Anonymous said...

can any body tell in detail about Govind Upadhyay.

पद्मनाभ मिश्र said...

मैं "बुनकर" मन्डली मे शामिल होना चाहता हूँ क्या करना पडेगा मुझे?

Vidhu said...

छाया की खिलखिलाहट के पीछे ...भी कुछ बुना जा सकता है ..सरल ताजगी भरी कहानी,बधाई..