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मंगलवार, दिसंबर 05, 2006

कवर स्टोरी: घासीराम की भैंस

पहले एक डिस्क्लेमरः इस लेख में सभी पात्र, स्थान और घटनाएं काल्पनिक हैं। इसके बाद भी यदि आपको अपना पसन्दीदा चैनल, संवाददाता या उद्घोषक इसमें दिखता हो तो आपके लिए हमारी राय है कि इस लेख को मत पढे, उसी चैनल पर जाकर पकाऊ न्यूज देखें। किसी भी प्रकार के मानसिक कष्ट के लिए लेखक की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होगी। हमने किसी न्यूज चैनल विशेष को केंद्रित करके नहीं लिखा, लिख भी नहीं सकते, कोई चैनल विशेष है ही नहीं। सारे भेड़-चाल पर चल रहे हैं।

जो कहानी मैं आपको सुनाने वाला हूं, वो एक टीवी न्यूज़ चैनल (चैनल फ़ुल्ली फ़ालतू) के अन्दर की कहानी है। तो इसमें कुछ पात्र हैं, उनसे पहले परिचय कर लिया जाए-
गुल्लू – ये चैनल के मालिक हैं। समाज के हितों से इनका कोई सरोकार नहीं। चैनल पर क्या चलाने से कमाई कैसी होगी, टीआरपी कित्ती जाएगी उससे इनको पूरा-पूरा मतलब है। इनका पुराना धन्धा मसाले का कारोबार था, न्यूज चैनल को भी मसाले के कारोबार की तरह चलाते है।
गजोधर – ये जनाब मुख्य संपादक, प्रोडक्शन मैनेजर सब कुछ हैं। असफ़ल पत्रकार और छात्र नेता रहे इन जनाब को देश के हर न्यूज चैनल से धक्के मारकर निकाला जा चुका है, अब आखिरी पड़ाव ये चैनल है। चैनल पर वही चीज़ चलाते हैं जो जनता चाहती है, ऐसा इनका दावा है। ख़बर कैसी, क्या और कहां की है इससे कोई मतलब नहीं। टीआरपी में टॉप होना चाहिए। ख़बरों को बड़ा बनाना इन्हें बहुत अच्छा लगता है। गुल्लू की आँख के तारे है, इनकी बहन गुल्लू के भतीजे से जो ब्याही है।
निधि खोजी – ये संवाददाता है, जो सारा दिन मारी-मारी फिरती है, ख़बरों की तलाश में। अभी इनका प्रोबेशन पीरियड चल रहा है। इस धन्धे मे नयी है, लेकिन अदाएं कातिल है।
टप्पू – ये भी वरिष्ठ संवाददाता है, लेकिन बहुत खुर्राट और घाघ। लोगों से ख़बरें उगलवाना इन्हें बहुत अच्छी तरह से आता है। इनका मानना है कि नेताओं से ज्यादा जरुरी है गली मोहल्ले के आम आदमी को कवर करना। ये भी गजोधर की तरह अपने आखिरी चैनेल के पड़ाव पर है।
रुपाली – ये चैनल का फ़्रंट-एण्ड है यानि कि समाचार वाचिका बोले तो एंकर। इनकी अदाएं देखकर ही इन्हें रखा गया था। साथी एंकर इनको देखकर अपने समाचार पढने भूल जाते है। टेबिल के नीचे से भी पैर मारने की खबरे मिली है। दर्शक भी सिर्फ़ इन्हें देखते रहते है, वैसे भी समाचारों मे होता ही क्या है? पूरा आफिस इनकी अदाओं पर लट्टू है। इनके बारे मे रोज रोज नयी नयी अफ़वाहों का बाजार गर्म रहता है।

आइए परिचय तो हो गया, इसके अलावा भी कुछ और पात्र आते जाते रहेंगे, समय रहते उनका परिचय भी कराया जाएगा। आइये अब चले चैनल के ऑफ़िस के अन्दर।

गुल्लू-गजोधर संवाद
स्थान:न्यूज चैनल का आफ़िस
समय : सुबह नौ बजे।

गुल्लू- आज क्या दिखा रहे हो गजोधर?
गजोधर- सर जी! अभी तो ख़ास ख़बर दिखी नहीं, थोड़ी देर में बता सकूंगा।
गुल्लू- देखना उन सालों (प्रतिद्वंदी चैनल का नाम लेकर) के हाथ कोई बटेर ना लग जाए, उनसे पहले हमारा चैनल
होना चाहिए। ख़बर ऐसी हो जो जनता के दिल के क़रीब हो।
गजोधर- आप चिन्ता मत करें सर हमारे रिपोर्टर गली-गली में घूम रहे हैं। मै अभी आपको कॉल करता हूँ।

(तभी दूसरी लाइन पर निधि की कॉल है, गजोधर, गुल्लू को फ़ोन रखवाकर, निधि से बात करता है)

निधि- सर! आज कोई ख़ास ख़बर नहीं दिखती।

गजोधर- अरे! कोई नेता नहीं मरा, किसी ने रिश्वत नहीं ली, कोई भी बच्चा गढ्ढे में नहीं गिरा? ऐसा कैसे हो सकता है? ढूंढों, और हां फ़लां चैनल पर भी नज़र रखना। जिस ख़बर की किसी भी सतह पर वो जाएं, हम उस ख़बर के अन्दर घुस जाएंगे।
निधी- सर जी! एक ख़बर है, मैंने आपको बताना मुनासिब नहीं समझा था, लेकिन फ़लां चैनल उसे दिखा रहा है।
गजोधर- अच्छा, क्या ख़बर है?
निधी- सर जी! ढक्कनपुरवा गांव में घासीराम की भैंस भाग गयी है। वैसे घबराने की कोई बात नहीं है, कई बार पहले भी भाग चुकी है। शाम तक लौट आएगी।
गजोधर- अरे वापस कैसे आयेगी, हम है ना। अच्छा ठीक है, तुम ढक्कनपुरवा पहुंचो, हम टप्पू को भी भेजते हैं। उसके साथ ख़बर को कवर करो। उस मोहल्ले के अपने सिटीजन रिपोर्टर (फुरसतिया) को खबर कर दो, कि भैंस को ढूंढे और अगर मिल जाए तो उसे स्टूडियों मे आंगन मे बाँध दे। शाम तक भैंस किसी को मिलनी नही चाहिए, आज की कवर स्टोरी यही रहेगी, घासीराम की भैंस।
भैंस
स्थान- ढक्कनपुरवा
समय- सुबह दस बजे


रुपाली (स्टूडियो से) : निधि....निधि.... क्या आप हमारी बात सुन सकती हो....निधि निधि..... लगता है हमारा सम्पर्क निधि से टूट गया है।
निधि: हाँ..... कौन है उधर, अच्छा रुपाली, आज कौन सी साड़ी पहने हो...और कल रात कहाँ टहल रही थी?
रुपाली : निधि...हम लाइव है, रिपोर्ट के बारे मे बताइए....
निधि- ओह! सॉरी, मैं निधि खोजी, चैनल फ़ुल्ली फ़ालतू के लिए ढक्कनपुरवा से रिपोर्ट कर रही हूं। हम आपको बता दें कि घासीराम की भैंस अपने घर से खूंटा तोड़कर भाग गयी है, आइये बात करते हैं घांसीराम से।
निधि- घासीराम जी, दर्शकों को इस पूरे हादसे के बारे में बताएं। क्या हुआ था आज सुबह जब आपने अपनी भैंस को विदा किया था।
घासीराम- हम का बताएं, हमरी तो जान ही चली गई। हाय सुंदरी, हाय रे सुंदरी। (रोना शुरू कर देता है)
निधि : देखिए घासी राम जी, रोना बन्द कीजिए, और हमे पूरी घटना के बारे मे बताइए।

रुपाली - आप इस वक़्त करोड़ों दर्शकों के सामने हैं। देश-विदेश में आपको लाइव देखा जा रहा है। घासीराम जी, दर्शक जानना चाहेंगे कि क्या हुआ था आज सुबह। आखिर किस बात पर सुंदरी नाराज़ होकर चली गई?

घासीराम – पता नहीं बहनजी (बहन जी के नाम पर रुपाली के चेहरे पर अजीब भाव आए), हमें का पता सुंदरी को हमारी कौन-सी बात बुरी लग गई। हम तो आज सुबह दुहे ही नहीं थे। हम सुबह ही कल्लू के घर चले गए थे। आकर देखा तो सुंदर नहीं है। खूंटे की रस्सी टूटी मिली। हमें का पता था कि सुंदरी को हमरी कौन सी बात बुरी लग गई।

निधि- (कान का टेपा ठीक करते हुए) घासीराम जी यानी आप कह रहे हैं कि सुंदरी को आपने सुबह नहीं दुहा था। इत्ती सुबह आप कल्लू के घर क्यों गए थे? (फिर से बालों की लटों को झटकटे हुए)

घासीराम – अब काहे का कल्लू और काहे का उसका घर.. बेचारा कल्लू आज ही भगवान को प्यारा हो गया। चल बसा। सुबह हम तभी दिशा-मैदान से आए और तबेले में जाने वाले थे कि इत्ते में रामलाल साइकिल से आया और हमको बताया कि कल्लू गुज़र गया। वहीं मिट्टी में चले गए बहन जी।

निधि – ये कल्लू कौन है?
घासीराम – हमरा मित्र था कल्लू। हम साथ-साथ ही दो जमात तक पढ़े थे।
निधि- क्या करता था ये कल्लू?
घासीराम- करने को क्या है बहन जी यहां.. दो जून की रोटी के लिए खेती-बाड़ी कर लेते हैं। कल्लू किसानी करता था। पिछले साल नकदी फसल के चक्कर में आ गया, बैंक से करजा लिया और ये साल बारिस ने धोखा दे दिया। निकल गया था बेचारे का दिवाला। तगादे से तंग आकर कल रात फांसी लगा ली उसने।

निधि – कितना कर्ज़ा था कल्लू पर...
(तभी कान के टेपे पर चैनल प्रोड्यूसर गजोधर की आवाज़ गूंजती है- "don't change the topic!! @#$% the कल्लू and his loan, get back to भैंस। निधि, भैंस हमारी कवर स्टोरी है, कल्लू की आत्महत्या नही। घासीराम से सुंदरी भैंस के बारे में बात करो" )
रुपाली - (बीच में टोकते हुए) घासीराम जी, सुंदरी के बारे में दर्शक विस्तार से जानना चाहेंगे।
निधि- घासीराम जी, जनता जानना चाहती है कि सुंदरी दिखने में कैसी थी, क्या करती थी, उसकी हॉबीज़ क्या थीं? जब आपने उसे आख़री बार देखा था तब उसे देखकर क्या लगा था कि वो ऐसा कर सकती है? उसका किसी पड़ोसी भैंसे से कोई चक्कर वगैरह.....
घासीराम : हमरी भैंस, ( और वो फिर से दहाड़े मार-मार कर रोने लगता है)
रुपाली : घासीराम जी, धैर्य मत खोइए, आपकी भैंस मिल जाएगी। घासीराम जी....घासीराम जी, निधि...निधि...
रुपाली: लगता है घासीराम से हमारा सम्पर्क टूट गया। हम अभी वापस लौटते है। हमारे जो दर्शक हमें फोन करना चाहे वो अपने मोबाइल से XXXX डायल करें, आपकी राय जानना हमारे लिए बहुत जरुरी है। यदि आपके कुछ सवाल भी है तो वो भी बताइए, (नोट: प्रत्येक कॉल की कीमत, ४ रु. प्रति मिनट है, इसमे गुल्लू के ३ रु और १ रु मोबाइल कम्पनी का) आप जाइएगा नही हम इस खबर पर बने हुए है, हम लौटते है, एक छोटे से ब्रेक के बाद।

इधर गजोधर को एक फोन आता है, फ़ुरसतिया का, जिसमे उसने बताया कि घासीराम की भैंस, तालाब में तैराकी की प्रैक्टिस कर रही थी, गजोधर ने फुरसतिया को भैंस को स्टूडियों के आंगन मे बाँधने को कहा, बदले मे फुरसतिया के ब्लॉग की रात को १२ बजे समीक्षा दिखायी जाएगी। एक घन्टे मे फुरसतिया मय नए रस्से के भैंस को स्टूडियों मे बाध आता है और अपनी नयी ब्लॉग पोस्ट मे जुट जाता है। इधर गजोधर, गुल्लू को भैंस की स्टोरी के लिए, कोई प्रायोजक ढूंढने को बोलता है। गजोधर अपने मातहतों को कुछ पर्यारवरण एक्टिविस्ट, कुछ पशु एक्सपर्ट, और कुछ मनोचिकित्सकों को स्टूडियों मे बुलाने के लिए बोलता है। अब चूंकि चुनाव का माहौल है, इसलिए राज्य सरकार, केन्द्र सरकार और विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के पास इस मसले पर राय जानने के लिए रिपोर्टर भेजने का जुगाड़ करता है। और हाँ भैंस को स्टूडियो के पिछवाड़े बाँध दिया जाता है, आखिर वही तो कवर स्टोरी है।


आगे की कहानी ... पद्मनाभ मिश्र की कलम से

शुक्रवार, दिसंबर 31, 2004

मरीचिका: अध्याय 1: यादें

नोटः इस कहानी के सारे पात्र काल्पनिक है, यदि किसी पात्र में आपको अपना या किसी परिचित का चेहरा दिखे, तो अपनी चप्पल उठाकर मारने मत चले आना, फेंकी हुई चप्पलें सादर वापस प्रेषित कर दी जायेंगी.

रविवार की छुट्टी और सुबह उठते ही छाया रवि को चाय के कप से साथ सामानों की लिस्ट थमा कर बोली, "जरूरी सामान है, अभी लाने हैं, सो चाय पीकर तुरन्त निकलो...वरना सुपर मार्केट में भीड़ हो जायेगी"। आज रवि को छुट्टी के दिन सुपर मार्केट जाना बड़ा खल रहा था, टीवी पर भारत और पाकिस्तान का क्रिकेट मैच जो आना था। पहले पहल तो रवि ने साफ मना कर दिया, छाया का पारा और हाइ होने लगा और रवि बेफिक्र होकर अपने ८ साल के बेटे मनन के साथ बैठकर टीवी पर मैच देखने लगा। मैच अभी शुरु ही होने वाला था, छाया ने फिर कहा, "अगर सामान नही आयेगा तो ब्रेकफास्ट भी नही मिलेगा, ये सोच लेना। ब्रेकफास्ट करना है तो सामान तुरंत जाकर ले आओ वरना अपना ब्रेकफास्ट आप ही बनाते रहना, मैं तो चली बाजार"। गुस्से में छाया ने कार की चाभी भी उठा ली थी। अब जब छाया ने खुद बाजार जाने की धमकी दी तब रवि को अपने मैच की इच्छा को दरकिनार कर चाय पीकर मजबूरन सुपर मार्केट की ओर रूख करना ही पड़ा।

किसी तरह से पार्किंग में जगह ढूंढ ढांढ कर, गाड़ी लगाकर, रवि ने मेन एन्टरेन्स से प्रवेश किया। सहसा उसकी नज़र दूसरी तरफ के एक्जिट की तरफ पड़ी। एक खूबसूरत महिला अपने सामान की ट्राली लेकर बाहर निकल रही थी, उम्र होगी यही कोई तीस बत्तीस साल, लेकिन चेहरे और व्यक्तित्व से कहीं से भी वो पच्चीस बरस से ज्यादा की नही दिख रही थी। हल्के गुलाबी रंग की साड़ी, माथे पर बिन्दी, खुले लहराते बाल...फिरंगी औरतों के बीच वह एकदम अलग दिख रही थी, जैसे कोई खिलता हुआ कमल। महिला अपनी धुन में चली जा रही थी, रवि की नजर जाने अनजाने ही उसके चेहरे की तरफ गयी, वो चौंक पड़ा, चेहरा बड़ा जाना पहचाना सा था, रवि को ख्याल आया कहीं....कहीं यह विभा तो नही.....विभा? ये कैसे हो सकता है....वो यहाँ कैसे?....नहीं नहीं ये विभा नही हो सकती.....वो तो........।

रवि पुरानी यादों में खो गया, उसकी आंखो के सामने विभा का चेहरा घूमने लगा...वो खिलखिलाता हुआ चेहरा, वो झील सी गहरी आंखे, सुराहीदार गर्दन, आंखों में शरारत, होंठ जैसे अभी मुस्करा देंगे। रवि पुरानी यादो की वादियों में कहीं खो सा गया, लेकिन सहसा ही उसे ये आभास हुआ कि वो सुपर मार्केट में है। विभा जैसी दिखने वाली युवती मार्केट से बाहर निकल चुकी थी, बाहर निकलने के लिये रवि को भी काफी आगे जाना पड़ा, रविवार होने के कारण काफी रश भी था। जल्दी जल्दी बाहर निकल कर रवि की आंखे विभा को ढूंढने लगी....सारी पार्किंग टटोह ली पर कहीं भी वो नही दिखी.....रवि भारी मन से पुनः मेन एन्टरेन्स की तरफ बढने लगा। अचानक एक गाड़ी उसके सामने से गुजरी जिसमें कोई पुरूष गाड़ी चला रहा था और वह युवती, जिसे रवि विभा समझ रहा था, साथ में बैठी थी। रवि को फिर उसकी एक झलक दिखायी दी, हाँ वो विभा ही थी, वही चेहरा, वही नैन नक्श, वही नाक, वही बाल, वही हंसी, खिलखिलाने का वही अन्दाज़। अब रवि को विश्वास हो चला था। इतने सालों में भी विभा बिल्कुल नही बदली थी...वही मनमोहक छवि। लेकिन विभा यहाँ अमरीका में, ऐसा कैसे हो सकता है, विभा को तो हिन्दुस्तान बहुत प्यारा था और उसे वह किसी भी कीमत पर छोड़ना नही चाहती थी। रवि को सारी पुरानी बातें याद आने लगी, एक चलचित्र की मानिन्द वो पुराने दिन उसकी आंखो के सामने से गुज़रने लगे। वो पुराने दिन, जिन्हें याद करने पर दर्द मिलता है...सिर्फ दर्द।

इतने सालों बाद विभा की एक झलक रवि के दिल के तारों को पूरी तरह से झंझोड़ गयी, उसके दिल में भावनाओं के जैसे ज्वार आ गया था।
रवि अपनी वैवाहिक जिन्दगी से खुश था। उसकी पत्नी छाया, जिससे वह अमरीका में आने के बाद ही मिला था, दोनों साथ साथ काम करते थे। दोनों ने काफी सोच विचार के बाद शादी का फैसला किया था। छाया अमरीका में ही पली बढी थी, लिहाजा विचार काफी उदारवादी थे। वह शादी को कोई बन्धन ना मानकर दोस्ती का एक इकरारनामा मानती थी। रवि की शादी को लगभग दस साल होने को आये लेकिन दोनों के बीच का रिश्ता पति पत्नी के संबंधों से कहीं बढकर था, वे एक दूसरे के लिये सच्चे दोस्त जैसे थे और एक दूसरे से बेहद प्यार भी करते थे। मनन, जो अमरीका में ही पैदा हुआ और अमरीकियों की तरह ही दिखता था, के आने के बाद दोनों के रिश्ते जैसे सिमेंट से बँध गए। लेकिन विभा...उसे रवि कभी भी नही भुला सका...इतने सालों बाद विभा की एक झलक रवि के दिल के तारों को पूरी तरह से झंझोड़ गयी, उसके दिल में भावनाओं के जैसे ज्वार आ गया था। समय जैसे थम सा गया था...रवि का मन अतीत के पलों को पुनः जीवित करने लगा।

विभा और रवि बचपन के साथी होने के साथ साथ, कालेज में सहपाठी भी थे। दोनों एक ही मोहल्ले में रहते थे। रवि अपने परिवार का एकलौता बेटा था और बहुत ही नाजो नखरों में पला बढा था, लेकिन फिर भी वह अपने पिताजी और माताजी का आज्ञाकारी बेटा था। रवि के पिताजी का अच्छा खासा चलता व्यवसाय था, अनेक सामाजिक संस्थाओ के वे संरक्षक थे, समाज में बहुत रूतबा था। रवि इतने ऐशो आराम में पलने के बावजूद भी नही बिगड़ा तो यह उसके माता पिता का दिये हुए संस्कार ही थे...वरना आजकल ऐसे बच्चे कहाँ मिलते है। विभा अपने घर में सबसे बड़ी थी, उसके बाद उसकी छोटी बहन और एक छोटा भाई था।

विभा के पिता किसी सरकारी आफिस में मुलाजिम थे, रूतबे और हैसियत में रवि के परिवार के सामने कहीं भी नही ठहरते थे। लेकिन उनके परिवार का मोहल्ले में बहुत मान सम्मान था, विभा के बाबूजी की विनम्रता के सभी कायल थे। विभा और प्रतिभा, दोनों बहनों को कभी भी किसी ने घर के बाहर नही देखा था, जहाँ भी जाती अपने परिवार के साथ ही। विभा की माताजी बहुत धर्म कर्म वाली थी और सामाजिक रूप से काफी सक्रिय थी। दोनों परिवारों का एक दूसरे के घरों में काफी आना जाना था, रूतबा और हैसियत कभी भी दोनों परिवारों के रिश्तो के बीच में नही आयी। चाहे होली हो या दिवाली, या फिर कोई और त्योहार, दोनों परिवार साथ मिलकर ही मनाते थे। विभा के बाबूजी रवि को अपने बेटे जैसा मानते थे। इधर विभा को भी लगभग वही दर्जा रवि के घर में मिला हुआ था। जब कभी भी रवि की माँ बीमार पड़ती या फिर काम ज्यादा हो जाता, विभा, प्रतिभा या उसकी मां तुरन्त काम में हाथ बँटाने आ जाती।

जैसे जैसे रवि और विभा बड़े होने लगे, घरवालोंं को दोनों के भविष्य के कि चिंता सताने लगी, रवि की घरवालों ने तो विभा को अपनी बहू के रूप में सोच रखा था, लगभग यही सोच विभा के घरवालोंं की थी। घरवालोंं की बातो से अनजान रवि और विभा अच्छे दोस्तो की तरह रहते और अपने खुशी और गम साथ साथ बाँटते...ना रवि और ना ही कभी विभा ने एक दूसरे के बारे में सीरियसली सोचा था। लेकिन दिल के किसी कोने में दोनों को एक दूसरे के प्रति चाहत जरूर थी। यह बात दोनों जानते भी थे, लेकिन दोनों ही चाहते थे कि पहल दूसरी तरफ से हो। इधर विभा ने अपनी पढाई पूरी कर ली, पूरी यूनीवर्सिटी में टॉप किया था उसने, रवि भी अच्छे दर्जे से पास हुआ था। अब सवाल था कैरियर का। रवि के पिताजी ने फैसला किया था कि रवि को अपने व्यवसाय में शामिल करेंगे, जो रवि को कतई पसन्द नही था। उसकी इच्छा तो नौकरी करने की थी। वैसे भी रवि ने कई कम्पनियों में अर्जी दे रखी थी। उधर विभा के ऊपर भी घर की जिम्मेंदारियां आ रही थी, घर के खर्चे बढ रहे थे, बाबूजी पर कितना भार देती, वैसे भी उनके रिटायरमेंन्ट में भी तो कुछ ही साल बाकी थे, सो विभा ने भी कई कम्पनियों में नौकरी ढूंढना शुरू कर दिया।

पिताजी का दबाव बढते देखकर रवि ने बिजिनेस मैनेजमेंन्ट की पढाई के लिये अमरीका जाने की इच्छा जाहिर कर दी। सुझाव पर सोच विचार शुरू हो गया, लेकिन इकलौता लड़का कैसे घर से बाहर, परदेस में अकेला भेज दें। रोजाना इसी उधेड़बुन में बात शुरू होती और बिना किसी नतीजे के पहुँच कर खत्म हो जाती। रवि ने मन ही मन ठान ली थी कि अपने फैमिली के बिजिनेस में तो हाथ नही बँटायेगा।

ना रवि और ना ही कभी विभा ने एक दूसरे के बारे में सीरियसली सोचा था। लेकिन दिल के किसी कोने में दोनों को एक दूसरे के प्रति चाहत जरूर थी। यह बात दोनों जानते भी थे, लेकिन दोनों ही चाहते थे कि पहल दूसरी तरफ से हो।

उधर विभा को एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी में अच्छी नौकरी मिल गयी। यूनीवर्सिटी में अव्वल आने के कारण उसे वरियता मिली था। काम ठीकठाक था लेकिन बड़ी कम्पनी होने के कारण तनख्वाह काफी अच्छी था। उसने घर के खर्चों में हाथ बंटाना शुरु कर दिया था। जिन्दगी व्यवस्थित ढंग से चल रही थी, सब कुछ अच्छा चल रहा था पर होनी को शायद कुछ और ही मन्जूर था। विभा के पिताजी की सहसा एक सड़क दुर्घटना में अकाल मृत्यु हो गयी। विभा के परिवार पर तो जैसे मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ा, घर की सारी ज़िम्मेदारीयां अब विभा के कन्धों पर आ गयी। ऐसे में रवि के परिवार ने विभा के परिवार का काफी साथ दिया, रवि और विभा भी काफी करीब आ गये, दोनों के बीच में प्यार का बीज तो पहले ही पड़ चुका था, अब बस इकरार की देर थी। दोनों एक दूसरे के करीब आते गये और साथ जीने मरने की कसमें तक खा ली। लेकिन विभा पर अब पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी थी, तो कोई भी कदम काफी सोच विचार करने के बाद ही उठाने का फैसला हुआ।

इधर दिन गुजरते गये...आखिरकार वो दिन भी आया जिस दिन का रवि को इन्तजार था...अमरीका के एक नामी गिरामी बिजिनेस स्कूल में रवि को दाखिला मिल गया था, अगले महीने ही अमरीका पहुँचना था...यह एक ऐसा अवसर था जिसके लिये लोग लाख एड़ियां रगड़ते है। रवि के घरवाले सोच में पड़ गये कि अमरीका भेजे या ना भेजे...उधर रवि और विभा भी सोच विचार में थे कि क्या करें।

[अगला अध्याय: लेखक ~ अतुल अरोरा]