Tuesday, February 15, 2005

मृत्युंजय : अध्याय ३ : होनी तो हो के रहे..

[गताँक से आगे]
आज फिर मृत्युञ्जय दफ्तर की कुर्सी पर बैठा सोच में डूबा था। नज़रें कंप्यूटर पर लगे स्क्रीन सेवर पर लगी थीं जो विचित्र से जाल बुन रहा था उस के मॉनीटर पर। पिछले दिनों में ऐसा अक्सर ही हो रहा था, कि वह काम करने की बजाय मॉनीटर को निहारता, सम्मोहन की सी मुद्रा में बैठा रहता। इस समय शाम हो रही थी, और दफ्तर के अधिकांश लोग जा चुके थे। उसने सामने दीवार पर लगे कैलेंडर पर नज़र डाली - १४ फरवरी। ढ़ाई महीने रह गए थे उसके पास। दो सप्ताह पहले यहीं बैठे बैठे उसने वह लिफाफा खोला था जिसने उस की रातों की नींद और दिन का चैन लूट लिए थे। एक बार फिर घड़ी देखी उसने -- अभी अठावन मिनट बाद वह एयरपोर्ट पर उसे लेने जा रहा था, पर एक एक मिनट काटना उसे पहाड़ सा लग रहा था।

जीवन में पहली बार मृत्युञ्जय इतने तनाव से गुज़र रहा था। अमर के साथ हुए हादसे और इस पुस्तक की भविष्यवाणी ने उस की विचारधारा की नींव को झकझोर दिया था। लगातार उसके मन में द्वन्द्व चलता रहता - "नहीं, ऐसा कैसे हो सकता है, आखिर अमर ने अपने जीवन के कौन से आंकड़ों का विश्लेषण कर के यह तिथि निकाली होगी, और मेरे जीवन के भी वही आँकड़े उसे कैसे मालूम थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि यह महज़ एक इत्तफाक हो? इत्तफाक? इतना बड़ा इत्तफाक तो नहीं हो सकता। बेटा मृत्युञ्जय! मरने के लिए तैयार हो जा।"


मृत्युञ्जय आधी आधी रात को जाग कर इन्हीं विचारों में डूब जाता था और नींद आँखों में लौटने का नाम नहीं लेती थी।
पिछले दो सप्ताह से वह इसी उधेड़बुन में रहता था। आधी आधी रात को जाग कर इन्हीं विचारों में डूब जाता था और नींद आँखों में लौटने का नाम नहीं लेती थी। जाने कितनी नींद की गोलियाँ खा ली होंगीं उसने इन दिनों में। उसके दफ्तर के काम पर भी असर पड़ रहा था और जो उसने योजनाएँ बनाई थीं उन्हें भी कार्यान्वित नहीं कर पाया था।

उसने कई कई बार अमर के भेजे पुलिन्दे को पढ़ा, उसमें की गई गणनाओं को समझने का प्रयत्न किया, पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया था। केवल एक बात निश्चित थी कि अमर की मौत की तारीख वही थी जो गणना के अन्त में लिखी थी। काश वह किताब उसे मिल जाती, तो वह स्वयं कुछ समझने की कोशिश करता। उसने अमर के घर जाकर उसके पिता जी से भी बात की थी, "अंकल, अमर का जो सामान वापस आया है, ज़रा उस में देखिए मेरी एक किताब थी। मिल जाए तो मुझे दे दीजिएगा।"

अमर के पिता ने कहा कि उसके कपड़ों के इलावा कुछ नहीं है सामान में। साथ में उन्होंने उस से सहायता भी मांगी थी, "बेटा, सीएट्ल की एक बीमा कंपनी कुछ हरजाना दे रही है। अमर के नौकरी करने से हमारी आर्थिक स्थिति कुछ सुधरने लगी थी, तुम्हें तो पता ही है उस की पढ़ाई पर भी कितना खर्च हुआ था। बहन की शादी के लिए बैंक लोन की अर्ज़ी भी दी थी उसने, पर अब मना हो गई है। वह होता तो सब ठीक हो जाता। अब अमर तो वापस आ नहीं सकता, पर इस बीमा कंपनी के साथ फॉलो-अप करना है। मैं तो किसी को जानता नहीं, मेरे पास पासपोर्ट-वीज़ा भी नहीं है, जो खुद जा सकूँ।"

"कोई बात नहीं अंकल, मैं अमरीका में अपने सहयोगियों से बात कर लूंगा। काम हो जाएगा, आप चिन्ता न करें। आप बस एक अथारिटी लेटर दे दीजिएगा।"

मृत्युञ्जय ने अमरीका में विशाल को फोन कर के बीमा कंपनी का काम करने के लिए कह दिया था। साथ में पुस्तक के बारे में भी छानबीन की थी कि वहाँ तो नहीं रह गई है, पर कुछ हाथ नहीं लगा। फिर उसे याद आया, अमर ने लिखा था, "यह किताब तो गई कूड़ेदान में।" इसका मतलब उसने शायद वह किताब सचमुच फेंक दी थी। बेचारे अमर को क्या पता था कि यह किताब इतनी सही निकलेगी।

विशाल ने बताया, "यार मुझ से अमर ने किताब के बारे में तो कुछ नहीं बताया, हाँ हादसे के दिन वह काफी तनाव में था जो मेरी कुछ समझ में नहीं आया। सुबह अपनी रेण्टल कार में मुझे उसने आफिस भी छोड़ा और कहा कि उसे कहीं और जाना है। बड़ा सेंटी हो रहा था, गले-वले भी मिल कर गया। ऐसा लगा उसको कुछ पूर्व बोध सा था, अपनी मौत का। बस मुझे छोड़ कर गया और कुछ घंटों बाद ही खबर मिली कि हाइवे पर काफी तेज़ गति से उसकी कार सड़क से उतर कर पेड़ से टकरा गई थी। पुलिस कारण नहीं पता कर पाई, लगता है कार पर नियन्त्रण खो बैठा था वह।" मृत्युञ्जय सोचने लगा कि किताब की बात नकारने के बावजूद उसे शक था गणना के सच होने का। पर विशाल से उसने इस बात का कोई ज़िक्र नहीं किया, और फोन रख दिया।

पिछले सप्ताह मृत्युञ्जय ने एक बार फिर अप्पा बलवंत चौक का चक्कर लगाया। केवल उस दुकानदार के पास ही नहीं, सभी पुरानी पुस्तकें बेचने वाली दुकानों को छान मारा, पर उस पुस्तक की दूसरी प्रति नहीं मिली। इंटरनेट पर भी खूब खोज की मृत्युञ्जय ने, पर लग रहा था कि अमर के भगवान ने विशेषकर इस पुस्तक की एक कापी उसी के लिए भेजी थी।

कंपनी के कई लोग दरअसल मृत्युञ्जय और अमर दोनों के पूर्व-सहपाठी थे। पुणे के ही एक कालेज में कंप्यूटर इंजीनियरिंग के अन्तिम वर्ष में सब का एक साथ इस बहुराष्ट्रीय कंपनी में चयन हुआ था। चूंकि कंपनी के लगभग सभी प्रॉजेक्ट विदेशों में थे, इन सब का विदेश आना जाना लगा रहता था। कालेज में मृत्युञ्जय, अमर, सावित्री (सावी) और विशाल की चौकड़ी हमेशा साथ रहती थी। सावी और विशाल कुछ समय से देश से बाहर पोस्टेड थे, और मृत्युञ्जय और अमर भारत में। सावी जर्मनी में थी, और विशाल अमरीका में।

सावी बहुत ही आत्मनिर्भर, आत्मसम्मान से भरी लड़की थी, और सब लड़कियों से अलग। कालेज में लड़कों को ज़रूरत से ज़्यादा लिफ्ट नहीं देती थी, पर लड़कियों के झुंड में भी नहीं रहती थी। बस इन चार विद्यार्थियों का ग्रुप हमेशा साथ रहता था। चारों विद्यार्थियों में काफी कुछ समान था। सब निम्न मध्य-वर्गीय परिवारों से थे, छोटे शहरों से आए थे और घर से दूर यहाँ पढ़ते थे। मेधावी छात्र थे, और रोमांस आदि के विचारों से चारों दूर थे।


सावित्री से मृत्युञ्जय की विचारधारा हूबहू मिलती थी। धर्म, ईश्वर, विज्ञान आदि के बारे में दोनों के विचार बिल्कुल एक जैसे थे।
कालेज के बाद एक ही कंपनी में काम करने के कारण काफी समय तक इनकी चौकड़ी साथ रही। फिर विशाल ने शादी कर ली थी, और वह अमरीका चला गया था। अमर लड़कियों के मामले में काफी शर्मीला था, कहता था अरेंज्ड मेरेज करनी नहीं है, और अपनी पसन्द की लड़की को कभी पटा नहीं पाऊँगा, इसलिए शायद कुँवारा ही न मर जाऊँ। जाने अनजाने उसकी बात सच ही निकली थी।

सावित्री से मृत्युञ्जय की विचारधारा हूबहू मिलती थी। धर्म, ईश्वर, विज्ञान आदि के बारे में दोनों के विचार बिल्कुल एक जैसे थे। कालेज से बाहर आने के बाद दोनों काफी करीब भी आ गए थे। मृत्युञ्जय तो उस से मन ही मन प्यार भी करने लगा था। उसे लगता था कि सावित्री भी उस से प्यार करती थी, पर सावित्री ने कभी कुछ कहा नहीं था। पुरानी दोस्ती कुछ अजीब सी अड़चन बन कर आ रही थी बीच में। वह सोचता था उसने मना कर दिया तो जो है, उसे भी खो दूंगा।

अब सिर पर मंडराते यमराज ने इस सारी कहानी को ख़त्म कर दिया था। उसने अभी तक किसी को बताया भी नहीं था अपने तनाव या उसके कारण के बारे में। सोच रहा था सब से मिल आएगा, घर भी हो आएगा, पर किसी को बताएगा नहीं, एक व्यक्ति को छोड़ कर -- सावी को। और आज सावी जर्मनी से भारत लौट रही थी। सवेरे मुंबई पहुँचने के बाद अब पुणे आ रही थी, और वह हवाई अड्डे उसे लेने जा रहा था।

एक ओर मृत्युञ्जय की बाँछें खिल रही थीं कि सावित्री अब स्थाई रूप से पुणे आ रही थी; कंपनी ने उसे अमर का स्थान लेने के लिए बुलाया था। दूसरी ओर, यह अजीब विडंबना थी कि अमर की दुखद मौत उसे सावित्री के करीब ला रही थी। पर क्या फायदा, अब ज़िन्दगी ही कितनी बची थी। चलो यही ग़नीमत है कि जीवन के अन्तिम दिन सावी के साथ बिता पाएगा। यही सोच रहा था, कि कंप्यूटर के अलार्म ने उसे याद दिलाया कि चलने का समय हो गया है।
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मृत्युञ्जय एयरपोर्ट पहुँचा तो पता लगा फ्लाइट आ गई है, पर सावी अभी बाहर नहीं आई थी। एयरपोर्ट के बुक स्टाल में घुसा, तो ग्रीटिंग कार्डों पर नज़र पड़ी। वेलंटाइन्स डे के कार्ड सब से नुमायाँ थे। उसने भी एक कार्ड खरीदा। पैसे देकर निकला तो आने वाले यात्री हाल में आते दिखे। दूर से सावी पर नज़र पड़ी। उसका दिल बल्लियों उछलने लगा। सामने आई तो हमेशा की तरह दोस्ती के अन्दाज़ में मिला - हाथ मिलाना, हल्का सा आलिंगन।

सामान लेकर वह लोग सीधे सावी के होटल गए। सावी चैक-इन करने गई और मृत्युञ्जय से रेस्तेराँ में इन्तज़ार करने को कहा। निश्चय हुआ डिनर साथ करेंगे, फिर मृत्युञ्जय जाएगा। मृत्युञ्जय ने रेस्तेराँ में अलग-थलग सी टेबल ली। उसने शुरुआत के लिए वाइन का आर्डर दिया, और वेटर से कैंड्ल लाइट का प्रबन्ध भी करवाया। ग्रीटिंग कार्ड पर एक बहुत ही रोमैंटिक सन्देश लिख कर उसने मेन्यू में छिपा दिया। ऐसा करते वह स्वयं को दोषी तो महसूस कर रहा था, पर वह बिना अपने प्यार का इज़हार किए दुनिया से जाना भी नहीं चाहता था।

सावी आई तो माहौल देख कर पहले तो ठिठकी, फिर मन्द मन्द मुस्कुराने लगी। मेन्यू को खोल कर कार्ड देखा और देखते ही अपने पर्स से उसने भी मृत्युञ्जय के लिए वेलंटाइन्स कार्ड निकाला और उसके सामने रख दिया। मृत्युञ्जय आनन्दातिरेक था, जीवन में पहली बार भावनाओं के अनुनाद से उत्पन्न लहराव का आभास हो रहा था उसे, बड़ा ही सुखद एहसास। उसको अपना जीवन सार्थक होता लग रहा था, पर कितना छोटा रह गया था उसका जीवन।


दोनों ने दो-दो वाइन के पैग पी लिए थे, और मृत्युञ्जय मन ही मन अपनी मौत का विषय छेड़ने की भूमिका बना रहा था।
दोनों बातें करने लगे और एक दूसरे को बताने लगे कि कब से एक दूसरे से प्रेम करते हैं। दोनों ने दो-दो वाइन के पैग पी लिए थे, और मृत्युञ्जय मन ही मन अपनी मौत का विषय छेड़ने की भूमिका बना रहा था। इतने में सावी ने अजीब हरकत की, पर्स से कुछ निकाल कर ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गई। पाश्चात्य अन्दाज़ में हाथ में अंगूठी की डिबिया ले कर बोली, "मृत्युञ्जय, विल यू मैरी मी?"

मृत्युञ्जय अवाक् रह गया। समझ में नहीं आ रहा था क्या कहे। बड़ी मुश्किल से हिम्मत जोड़ कर बोला, "सावी, मैं तुम से विवाह करूँगा तो दुनिया का सब से खुशकिस्मत आदमी होऊँगा, पर यह नहीं हो पाएगा।" यह कह कर उस ने विस्तार से अमर की, और किताब की सारी दास्तान उसे सुनाई।

सावी ने सारा किस्सा ध्यान से सुना, अन्त में खुल कर हंसने लगी। बोली, "मृत्युञ्जय, तुम पागल तो नहीं हो गए हो? आखिर ऐसी कौन सी गणना है, जिससे कोई किसी की मौत का दिन निकाल सकता है? यह एक संयोग के सिवा कुछ नहीं हो सकता कि अमर की जान इस तरह गई। मुझे भी दुख हुआ एक दोस्त को खोने का। अमरीका जाते हुए मुझसे वह फ्रैंकफर्ट में मिला, कुछ बता भी रहा था किताब के बारे में, पर मैंने सुनी अनसुनी कर दी।"

अब तक भोजन हो गया था, और मृत्युञ्जय ने चलने की बात की। बिल पर दस्तखत करने के बाद सावी बोली, "आओ, कमरे में चल कर कॉफी पीते हैं, तुम्हारे मूर्ख भेजे को लेक्चर की भी ज़रूरत है।"

सावी के कमरे में दोनों देर रात तक बातें करते रहे, मृत्युञ्जय बार बार उठता तो सावी उसे बिठा देती। वह उसे वही नुक्ते बता रही थी जो वह ख़ुद कभी अमर को बताया करता, कि किस प्रकार इस तरह की भविष्यवाणी करना असंभव है।

सुबह के चार बजे थे, आखिर वह चलने के लिए उठा तो दोनों ने एक दूसरे को बाहुपाश में बान्ध लिया। अनायास ही वह एक दूसरे को ऐसे चूमने लगे, जैसे सदियों का रुका बान्ध टूटा हो। अमर के लिए यह ज़िन्दगी का सब से हसीन दिन था। उसे अपनी ज़िन्दगी वापस मिल गई थी, और वह भी इतने सुन्दर रूप में। निशा के मद में चूर दोनों अपने आप को रोक नहीं पाए और एकाकार हो गए। आनन्द की पराकाष्ठा में मृत्युञ्जय बोल पड़ा, "कम से कम अब मैं कुँवारा तो नहीं मरूँगा!"

"मैं तुम्हें मरने दूँगी, तब ना।" सावी उसके सीने पर एक चुम्बन जड़ते हुए बोली।
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अगले कुछ हफ्ते कैसे गुज़रे, दोनों को पता भी नहीं चला। वे दोनों अपना सारा समय साथ व्यतीत करते, घूमते, अपने भविष्य के बारे में बातें करते रहते। अमर, उस की किताब और भविष्यवाणी की फिर कभी बात नहीं छिड़ी। मृत्युञ्जय उस बात को एक बुरा सपना समझ कर लगभग भूल भी चुका था। सावी और मृत्युञ्जय के परिवारों के बीच बात हो चुकी थी, और उनकी सगाई भी तै हो चुकी थी। सावी के पिताजी के कहने पर ४ मई का दिन सगाई का तै हुआ था, और देखते देखते वह दिन भी आ गया था।

कंपनी में दोनों का काम भी अच्छा चल रहा था। अधिक छुट्टी लेने का भी मौका नहीं था, इसलिए सगाई की रस्म के लिए दोनों के परिवार पुणे आए थे। देर शाम तक एक मन्दिर के हॉल में सगाई की रस्म चल रही थी। सब लोग बहुत ही खुश नज़र आ रहे थे। रस्म के बाद एक फार्महाउस पर पार्टी का इन्तज़ाम कराया था मृत्युञ्जय ने, सो सब लोग वहाँ के लिए रवाना हो रहे थे।

एक कार में मृत्युञ्जय और उस का परिवार था, और दूसरे में सावी और उसका परिवार। मृत्युञ्जय सामने बैठा था ड्राइवर के साथ वाली सीट पर, और उसके माता-पिता और छोटी बहन पीछे की सीट पर। मृत्युञ्जय ने पूरे काफिले को रास्ता भी दिखाना था।

मृत्युञ्जय रास्ते में विचारों में डूब गया। अपने भाग्य पर उसे विश्वास नहीं हो रहा था। देखते देखते, ४ मई का दिन भी समाप्त हो रहा था और उसे अपनी मूर्खता पर हंसी भी आ रही थी। पिछले तीन महीनों की घटनाएँ चलचित्र की तरह उसकी आँखों के सामने घूम रही थीं, कि किस तरह पहले दो सप्ताह पहाड़ की तरह गुज़रे थे और बाद का समय पलक झपकते बीत गया था। इन विचारों में उसने बाहर की ओर ध्यान दिया तो उसे लगा कि फार्म हाउस वाला मोड़ पीछे छूट रहा है। उसने ड्राइवर को टोका, "अरे भाई, यहाँ मोड़ना है!" ड्राइवर ने अचानक गाड़ी मोड़ी और मृत्युञ्जय की आँखें सामने से आती हुई गाड़ी की हेडलाइट से चुन्धिया गईं।

सावी जिस गाड़ी में थी, वह ठीक पीछे थी। मृत्युञ्जय की गाड़ी और सामने आने वाली गाड़ी की ज़ोरदार टक्कर उसने अपनी आँखों के सामने देखी। सावी के ड्राइवर ने बहुत ध्यान से टक्कर बचाते हुए गाड़ी रोकी। सावी बदहवास हो कर हादसे की जगह पर पहुँची, तो उसके होश उड़ गए। गाड़ी का सामने का शीशा चकनाचूर था और ड्राइवर का शरीर उछल कर सड़क पर आ गया था। बाकी सब लोग गाड़ी में ज़ख्मी थे; आवाज़ किसी की नहीं आ रही थी। बेहोश थे या मृत थे, उसकी समझ में अभी नहीं आ रहा था। सारा काफिला रुका और सब को अस्पताल पहुँचाया गया।
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आज ६ मई थी। सावित्री अस्पताल के मुर्दाघर के पास ठिठकी।
आज ६ मई थी। सावित्री अस्पताल के मुर्दाघर के पास ठिठकी। यदि हादसा बहुत बुरा हुआ होता तो शायद मृत्युञ्जय यहाँ पड़ा होता। लेकिन सब लोगों की जान बच गई थी। ड्राइवर आइ॰सी॰यू॰ में था, पर मृत्युञ्जय और उसके परिवार को आज हस्पताल से छुट्टी मिल रही थी। सीट-बेल्ट ने शायद उसे बचा लिया था।

हाथ में फूलों का गुलदस्ता लेकर जब सावी मृत्युञ्जय के कमरे में पहुँची तो वह उसी का इन्तज़ार कर रहा था। बोला, "विश्वास नहीं आ रहा आज ६ तारीख है। मैंने तो कल होश आते ही सब से पहले तारीख पता की।"

सावी बोली, "चलो, अब सब छोड कर नई ज़िन्दगी की शुरुआत करो। दिस इज़ द फर्स्ट डे आफ द रेस्ट आप अवर लाइफ..."

"...टुगेदर", मृत्युञ्जय ने जोड़ा।

"और अब टुगेदर हो ही गए हैं तो तुम्हें एक कहानी सुनाती हूँ जो अभी तक नहीं सुना पाई।" सावी बोली।

"जब अमर मुझे जर्मनी में मिला तो बात सिर्फ किताब की नहीं हुई। वह अजीब हालत में था। हम ने लंच इकट्ठे किया तो बोला, सावी मैं तुम से जी जान से ज़्यादा प्यार करता हूँ, तुम्हारे बग़ैर जी नहीं सकता, वग़ैरा, वग़ैरा। मैंने उसे बताया कि मुझे वह दोस्त के रूप में बहुत प्यारा है, पर प्यार मैं मृत्युञ्जय से करती हूँ। मैंने उसे ताकीद की कि तुम्हें कुछ न बताए। उसे मैंने यहाँ तक बता दिया कि मेरे माता पिता मेरी सगाई इसी साल कराना चाहते हैं और पिताजी ने तो ४ मई का अल्टीमेटम भी दे दिया है क्योंकि मेरी राशि के हिसाब से वह इस साल का अन्तिम मुहूर्त है। अब इससे पहले कि मेरे घरवाले किसी और को मेरे गले मढ़ दें, मैं मृत्युञ्जय से जल्दी बात करने वाली हूँ। उसने मुझे बताया तो नहीं, पर मुझे लगा उसे काफी शॉक हुआ, विशेषकर यह सुनकर कि मैं तुम्हें चाहती हूँ। कह रहा था कि सालों से मेरे साथ भविष्य के सपने देख रहा था। बाद में उसकी मौत के बारे में सुन कर और तुम से किताब की कहानी सुन कर मुझे लग रहा है कि उसका हादसा हादसा न होकर शायद नियोजित रहा हो।"

मृत्युञ्जय की समझ में कुछ कुछ आ रहा था, "मुझे लगता है कि अमरीका में कार हादसे के द्वारा उसने अपने परिवार की ज़िम्मेवारियाँ भी पूरी कीं। अलग अलग हरजाने मिला कर अच्छा खासा पैसा मिला है उसके परिवार को। .. अब अपनी मौत की तारीख तो उसने खुद गढ़ी थी, पर मुझे क्यों मार रहा था?"

"यह तो अब उसी से पूछना पड़ेगा।"

"मेरी सती सावित्री ने मुझे यमराज से नहीं छीना होता तो इस समय मैं तुम्हारे साथ नहीं अमर के साथ ही बतिया रहा होता।"

[समाप्त]










































3 comments:

Atul Arora said...

रमण भाई
बुनो कहानी की शुरूआत तो जीतू ने की| मेरी मसखरी के बाद देवाशीष कि शुरूआत और आप के द्वारा रचे गये अंत से लगता है कि भारी भारकम साहित्यकार मौजूद हैं हमारे बीच और बुनो कहानी शायद २००५ का ईंडिब्लाग का अवार्ड अवश्यंभावी विजेता है|

Debashish said...

बहुत ही मर्मस्पर्शी और अप्रत्याशित समापन है। इमानदारी से कहुँ तो जब मैंने कहानी प्रारंभ की तो अंत का कुछ भी विचार नहीँ किया था, बिना पुर्वाग्रह कुछ पढ़ना और भी आनंददायी होता है। नए किरदारों के नाम भी बड़े पसंद आए!

Jitendra Chaudhary said...

रमण भाई,
कहानी का अन्त काफी अच्छा लिखा आपने, शायद किसी भी ने ऐसा ना सोचा था. बहुत अच्छा लिखे हो भइये. अंतिम हिस्सा कुछ बड़ा जरूर था और पात्रो के परिचय मे थोड़ा ज्यादा गहरापन था, लेकिन अब मै सोचता हूँ कि इसका कहानी मे महत्वपूर्ण योगदान था.

यदि कहानी लिखने की आपकी यह प्रथम कोशिश थी, तो भइया मानना पड़ेगा, कि आग़ाज बहुत हसीन है. मुझे फ़ख्र है कि हमारे बीच एक उदीयमान कथाकार मौजूद है.