Friday, February 04, 2005

मृत्युंजय : अध्याय २ : क्या कल आएगा?

[गताँक से आगे]


प्रोज़ेक्ट मैनेजर का फोन था। डिलीवरी की डेडलाइन सिर पर थी, और मैनेजर साहब नतीजे के लिए उग्र हुए जा रहे थे। मृत्युंजय अगले तीन घंटे काम में इस क़दर व्यस्त रहा कि भूख-प्यास तो क्या सिगरेट के कश लेना भी भूल गया। अंतत: जब उसने प्रोजेक्ट पूरा कर लिया और खड़ूस मैनेजर को संतुष्ट कर दिया तब उसे अहसास हुआ कि उसने तो आज सुबह से कुछ खाया भी नहीं है। रात काफी हो चली थी। मृत्युंजय को अमर का भेजा लिफ़ाफ़ा फिर याद आ गया। उसे महसूस हुआ कि उसे एक पैग की सख्त जरूरत है। उसने अपना सामान समेटा और घर की ओर रूख किया।


मृत्युंजय तब किशोरावस्था में ही था, पाप-पुण्य की सही व्याख्या करने में असमर्थ था। पिता को देखते देखते उसने यह संस्कार स्पंज की तरह अनजाने ही सोख लिए थे।
ईश्वर या ईश्वरीय शक्ति को नकारने के मृत्युंजय के पास तमाम कारण थे। मृत्युंजय के पिता भीषण धर्म-भीरू थे, सुबहशाम बिला-नागा तीन-तीन घंटे भगवान की मूर्ति के सामने श्लोक पढ़ते, घंटियाँ टुनटुनाया करते, हफ़्ते में तीन दिन उपवास रखते और तमाम साधु-संतों के सत्संग में लगे रहते। मृत्युंजय तब किशोरावस्था में ही था, पाप-पुण्य की सही व्याख्या करने में असमर्थ था। पिता को देखते देखते उसने यह संस्कार स्पंज की तरह अनजाने ही सोख लिए थे। पिताजी एक दिन अपनी तीन घंटे की अनिवार्य पूजा अर्चना के दौरान ही कटे पेड़ की तरह लुढ़क गए। मुँह से खून की अनवरत धारा बह निकली थी और ज्यादा खून बहने से अस्पताल के रास्ते ही उन्होंने दम तोड़ दिया। बाद में पता चला था कि पेट का अल्सर फूट गया था जो कि ज्यादा उपवास करने के कारण पैदा हो गया था। जिस ईश्वर की आराधना में उसके पिता ने वर्षों उपवास रखे थे, वही उनकी मृत्यु का कारण बन गया था! यही नहीं, मृत्युंजय ने अपनी मासूम बहन को, जिसे वह संसार में सबसे ज्यादा चाहता था उसे अपने जीवन के पंद्रहवें बसंत में, ब्रेन‍ कैंसर से तिल-तिल मरते देखा था। उस वक्त मृत्युंजय ने हर धर्म के हर देवी देवताओं के चौखटे पर अपना माथा रगड़ा, परंतु अंधे और बहरे ईश्वर ने उसकी बात नहीं सुनी थी। इसके बाद मृत्युंजय ने कभी भी ईश्वर की ओर याचक नज़रों से नहीं देखा। उसे अहसास हो गया था कि वह नहीं है। कहीं भी नहीं। और अगर है भी तो कम से कम उसके लिए इस आस्था का कोई प्रयोजन नहीं है। उसने उसी पल से निश्चय कर लिया कि जीवन के पथ पर चलते वह कभी भी भगवान नाम की बैसाखी की चाह नहीं रखेगा।


जॉनीवाकर ब्लैकलेबल के दो नीट पैग हलक के नीचे उतारने के बाद मृत्युंजय की व्यग्रता कम हुई, शरीर पर हावी होती शिथिलता से उसे आराम का एहसास हुआ। उसने स्थिर मन से विचार किया, अगर नीली किताब में लिखे हर्फ सही हैं और अमर की गणना भी सही है, तो उसके पास सिर्फ तीन महीने का समय है। मंदहास के साथ उसने सोचा, तो क्यों न दो महीने के बाकी बचे जीवन को पूर्णता के साथ जिया जाए! जो काम करने हैं, जो दायित्व निभाने हैं, उन्हें पूर्ण करने को तो यह समय कम है, परंतु फिर भी कुछ योजनाएँ बनाई जा सकती हैं। उसके दिमाग में पहला विचार यह आया कि एकल प्रीमियम की कोई तगड़ी जीवन बीमा पॉलिसी ली जाए ताकि अकेली वृद्धा माँ को उसके अवसान के बाद कोई आर्थिक तकलीफ़ न झेलनी पड़े। लगभग आधे घंटे तक मृत्युंजय तमाम तरह की योजनाएँ बनाता रहा। मदिरा के असर से वह नींद के आगोश में कब चला गया, उसे पता ही नहीं चला।


मृत्युंजय ने कभी भी ईश्वर की ओर याचक नज़रों से नहीं देखा। उसे अहसास हो गया था कि वह नहीं है और अगर है भी तो कम से कम उसके लिए इस आस्था का कोई प्रयोजन नहीं है।
अगले दिन उसकी नींद खुली तो कमरे में धूप पसर चुकी थी। मोबाइल की घंटी लगातार बज रही थी। उसने नम्बर देखा, उसके मैनेजर का ही फोन था। मृत्युंजय का सर फटा जा रहा था, उस की इच्छा हुई कि मोबाइल खिड़की से बाहर फेंक दे पर अपनी इच्छा को दबाता हुआ वह फोन पर हाँ – हूँ करता रहा। मोबाइल बन्द कर वापस रखने गया तो फिर से उसकी नजर टेबल पर रखे अमर के भेजे लिफ़ाफ़े पर पड़ी, जिसे वह ऑफ़िस से घर ले आया था। तो यह हक़ीक़त ही थी कोई सपना नहीं, उसने सोचा। फिर उसे कल की बनाई हुई अपनी अनगिनत योजनाएँ याद आईं, जिन्हें वह इन तीन महीनों में पूरा करना चाहता था। उसके होठों की लकीरों पर विद्रूपता की क्षणिक मुस्कान आई, उसने अपने सिर को एक हल्का सा झटका दिया और बाथरूम में घुस गया नित्य का नियोजित काम निपटाने के लिए। उसने तय कर लिया था कि आगे उसे क्या करना है।


[अगला अध्याय: लेखक ~ रमण कौल]

2 comments:

Atul Arora said...

एक से बढकर एक| लेखक मित्रो क्या तीन ही किस्तो में समाप्त होगी यह कहानी? देवाशीष का जबरदस्त प्लाट में रवि भाई ने निरंतरता बनाये रखी है | मेरे विवार से इसे चार से पाँच किस्तो तक जाना चाहिए| आगे और कौन कौन है कतार में?

Raman Kaul said...

अगला हिस्सा मैं लिखता हूँ। कहानी ख़त्म कब होती है, यह देखते हैं। कोई और लेखकगण अगर तैयारी कर रहे हैं तो बताएँ।